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एक समय में पूरे अफगानिस्तान में बौद्ध धर्म था
दिल्ली में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के घर पर बुद्ध जयंति के अवसर पर ‘बौद्धजन महासभा’ (अखिल भारतीय बौद्धजन समिति की दिल्ली की शाखा) की ओर से 23 जून, 1956 के दिन आयोजन किया गया था। इस सभा में दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्र से चुनिंदा अस्पृश्य और बौद्धजन उपस्थित थे।
भव्य जुलूस
सभा से पहले दिल्ली में बुद्ध की प्रतिमा तथा छोटे बच्चों द्वारा अभिनीत बुदध के जीवन-प्रसंगों के सजीव दष्श्यों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गयी था।
शोभायात्रा में हिस्सा लेकर उसे सफल बनाने में सहयोग देनेवाले कार्यकर्ताओं और बाल अभिनेताओं को डॉ. बाबासाहेब के हाथों चांदी का तमगा और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं प्रदान की गइंर्।
इस समारोह में प. पू. बाबासाहेब अम्बेडकर ने संबोधित किया और कहा-
बहनों और भाइयों
बौद्ध धर्म यथार्थवादी धर्म है। केवल काल्पनिक बातों पर बुद्ध ने अपने धर्म का निर्माण नहीं किया। इसीलिए ईश्वर और आत्मा या इस प्रकार की अजीब बातों को बुद्ध नहीं मानते थे। बुद्ध अपने धर्म को धम्म कहते है। धम्म अर्थात् सदाचरण, सद्विरोध ... हुआ....विचार शुद्ध आचरण। मानव जिसे अनुभव नहीं कर सकता या जिसका अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता ऐसी किसी बात पर बुद्ध का विश्वास नहीं था।
हर धर्म के दो पहलु होते हैं। एक विचारों पर आधारित सिद्धान्त और दूसरा नीति-नियमों से संबंधित। इनमें से एक को दूसरे से अधिक महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। ब्राह्मण धर्म की ये दो बातें अगर देखें तो पता चलेगा कि यह धर्म नाशक है। क्योंकि, हिंदू धर्म का वैचारिक गठन मानव-मानवों के बीच की विषमता पर आधारित है। ब्राह्मण भ्रष् रहे या सर्वश्रेष्ठ रहे वही श्रेष्ठ है, यह इनकी सीख है। ब्राह्मणों से क्षत्रीय कनिष्ठ, क्षत्रीय से वैश्य और वैश्यों से शूद्र कनिष्ठ। आखरी तीन वर्णों को पढ़ने का अधिकार नहीं। ब्राह्मण को अध्ययन का अधिकार होने के कारण स्पष्ट है कि सभी वर्गों
प्रबुद्ध भारतः 21 जुलाई, 1956