418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि इस प्रकार ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर गंगा नदी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। कितने मूर्ख हैं वे सारे! गंगा नदी और लोगों के बीच ब्राह्मणों को दलाल माना जाता है। यह बहुत बड़ा आश्चर्य है।
पाप अगर ब्राह्मणों को दान देने से और गंगा नहाने से धुल जाता हो तो एक मनुष्य के मन में दूसरे मनुष्य के बारे में सहानुभूति बिल्कुल नहीं बचेगी। एक-दूसरे से कोई प्रेम नहीं करेंगे। ऐसे हालात में कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और सरकार का भी कोई महत्व नहीं बचेगा। लेकिन इसे स्वीकारने के लिए कोई भी तैयार नहीं है।
मैं जब मंत्री था तब एक बार हरिद्वार गया था। मंत्री था इसलिए मुझे वहां ऐसा एक छोटा मंदिर दिखाया गया जिसके चारों तरफ पानी था। उसे ‘हर की पौड़ी’ कहते हैं। वहां के पानी में मनुष्य की हड्डियां और अन्य सभी गंदी वस्तुएं इकट्ठा हुई थीं। कोई नाला भी उससे साफ होगा ऐसा लग रहा था। ऐसी उस हर की पौड़ी में हर महिला-पुरुष नहा रहे थे। उस पानी में मृतक की अस्थियां डालने से वह स्वर्ग जाएगा और उस पानी में उसके सगे-संबंधियों के नहाने से उनके सारे पाप धुल जाएंगे जैसी मूर्ख श्रद्धा क्यों प्रचलित होगी मेरी समझ में नहीं आता। मुझे लगता है कि इन सभी बातों के बारे में सोचा जरूर जाना चाहिए।
सोना कसौटी परखरा उतरे बगैर कोई उसेखरीदता नहीं। धर्म भी मानव के लिए उपयोगी है अथवा नहीं इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए। जब तक धर्म की ऐसी परीक्षा नहीं होती तब तक वह स्वीकार्य नहीं होता। हमारे पुरखे अशिक्षित थे इसलिए ब्राह्मणों के हर शब्द पर उन्होंने भोलेपन से विश्वास किया। अब जमाना बदल गया है। अब आपको अच्छी तरह सोच-विचार के बाद ही धर्म स्वीकार करना चाहिए।
हिंदू और बौद्ध धर्म में महान अंतर है। मैं वह सब आपको समझा देता हूं। मिलिंद राजा द्वारा भिक्षु आचार्य नागसेन के साथ की गई चर्चा प्रश्न-उत्तर रूप में ‘मिलिंद पन्ह’ ग्रंथ में दी गई है। इस अवसर पर मुझे उसकी याद आ रही है। लोग मुझसे पूछते हैं कि भारत से बौद्ध धर्म समाप्त क्यों हुआ? ऐसा ही एक सवाल मिलिंद राजा ने भिक्षु नागसेन से पूछा था। मिलिंद राजा ने कहा, धर्म का ”ास क्यों होता है? तब आचार्य नागसेन ने जवाब दिया था कि धर्म के ऱहास के तीन कारण होते हैं -
- जो धर्म तात्कालिक (सामयिक) होता है वह समाप्त हो जाता है। जब तक धर्म
लोगों के मन पर छाया रहता है तभी तक वह जिंदा होता है।
- धर्मोपदेशक अगर विद्वान नहीं हों और चर्चा के समय अगर वे अपने धर्म का
बेहतर ढंग से प्रतिपादन कर सफल नहीं हो सकें तो धर्म लोप हो जाता है।
- जब आम आदमी सच्चे धर्म पर निर्भर नहीं रहता, केवल नकल करता है तब