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धर्म लोप हो जाता है, क्योंकि नकल कभी चिरंतन नहीं हो सकती।
भारत से बौद्ध धर्म के लोप होने के जो कारण हैं उनसे इन कारणों का सीधा संबंध नहीं है। मैं इस बारे में किसी के भी साथ चर्चा करने के लिए तैयार हूं।
मैं आपको बताता हूं कि दुनिया के अखिल मानवों के कल्याण के लिए बौद्ध धर्म ही हमेशा के लिए रहेगा। मुसलमानों ने इस देश पर आक्रमण कर बौद्ध विहारों को ध्वस्त किया। बुद्ध मूर्तियों को तोड़ा। मूर्तियां तोड़ने के कारण उन्हें बुत शिकन यानी मूर्तियां तोड़ने वाले कहा जाता है। इसमें से बुत शब्द मूर्ति के लिए है। यह शब्द मूल बुद्ध शब्द का विकृत (अपभ्रंश) रूप है। मुसलमानों के बौद्ध धर्म पर आक्रमणों के बारे में मैं एक किताब लिख रहा हूं।
किसी जमाने में पूरा अफगानिस्तान बौद्ध देश था। आक्रमणकारी मुसलमानों को वहां कुछ लोग पीत वÐ धारण कर यहां से वहां जाते हुए दिखाई दिए। मुसलमान उप सेनापति ने उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकारने का संदेश भेजा। लेकिन भिक्षुओं ने वैसा करने से इनकार किया। एक दिन यह उप सेनापति जंगल से गुजर रहा था तब उसे वहां के पेड़ पर इंसानों के मुंड लटकते दिखाई दिए। उसे आश्चर्य लगा। करीब सात सौ भिक्षुओं का कत्ल करके उनके मुंड वहां के पेड़ों पर लटकाए हुए थे। यह देख कर अपने आदेश का गलत ढंग से पालन किए जाने का अहसास उसे हुआ और उसे बहुत खेद हुआ। तब तक अपनी जान और धर्म को बचाने के लिए सभी भिक्षु आगे चीन, तिब्बत और अन्य देशों में भाग गए। वही भिक्षु आगे जापान भी पहुंचे।
मुसलमानों ने बौद्ध और हिंदू धर्म पर आक्रमण किया था यह सच बात है। उन्होंने हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों के मंदिर ध्वस्त किए। हालांकि बौद्ध धर्म का जितना संबंध है उस बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है कि कई भिक्षुओं का कत्ल होने के बाद बचे हुए भिक्षुओं द्वारा दूसरे देशों में पालायन करने के कारण बौद्ध अनुयायी अंधकार में टटोल रहे थे। क्योंकि भिक्षु पैदाइशी भिक्षु नहीं होते उन्हें तैयार किया जाता है। उन पर कई तरह के संस्कार किए जाते हैं। ऐसे भिक्खु मुस्लिम आक्रमणों के बाद देश में नहीं बचे थे।
हर तरह के संकट से होकर भिक्षुओं को गुजरना पड़ता है। भिक्षुओं की शिक्षा के अलग- अलग पायदान होते हैं। अठारह वर्ष के छात्र को ज्येष्ठ भिक्षु के पास उच्च विद्यार्जन के लिए भेजा जाता था। वहां अच्छी तरह से पढ़ाई करने के बाद उम्र के पच्चीसवें साल वह ‘श्रामणेर’ बनने की योग्यता हासिल करता। ‘श्रामणेर’ आगे पांच सालों तक कठिन जीवन बिताने के बाद उसकी भिक्षु के रूप में ‘उपसंपदा’ की जाती थी। यानी कि पच्चीस वर्ष की उम्र तक अच्छी तरह अध्ययन करने के बाद अच्छा आचरण रखने में कामयाब होने के बाद ही कोई भिक्षु बन सकता था।