342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 448

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नागपूर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बौद्ध दीक्षाविधि होने के बाद मुंबई, पुणे आदि अन्य जगहों पर अन्य दलित भगीनी बंधुओं के सामूहिक धर्मांतरण के समय डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर उपस्थित रह पाएंगे या नहीं इस बारे में जानकारी बाद में दी जाएगी।

जो भगीनी और बंधुगण नागपूर के डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के धर्मांतरण दीक्षा समारोह में उपस्थित नहीं रह पाए उनके लिए कार्यक्रम की तस्वीरों सहित विस्तष्त जानकारी ‘प्रबुद्ध भारत’ के अगले अंक में दी जाएगी। ‘प्रबुद्ध भारत’ का अगला अंक

खास ‘‘बौद्ध-धम्म दीक्षा अंक’’ के नाम से ही प्रकाशित होगा। पाठक अपनी प्रति सुरक्षित कर लें।’’ ख्5,

‘नवयुग’ मुंबई के संवाददाता ने बौद्ध धम्मदीक्षा के इस कार्यक्रम के लिए उपस्थित रहने वालों के मुंबई से नागपूर तक की यात्रा का वर्णन और नागपुर में संपन्न समारोह का वर्णन इस प्रकार किया है-

‘‘जिनके बाप-दादाओं को सड़क पर थूकने की मनाही थी और उनका थूक रास्ते पर न गिरे इसलिए गले में मटका बांध कर घूमना पड़ता था, जिनके बाप-दादाओं को सड़क पर ब्राह्मण को आता देख कर उस पर अपना साया भी न गिरे इसलिए सड़क किनारे उगे झाड-झंखाडों में कूदना पड़ता था, जिन्हें आज तक गांवों के मरे जानवरों को ढोना पड़ता है, जिन्हें आज तक बेगार के लिए सताया जाता था, उन पांच लाख अस्पृश्य बंधुओं ने जीर्ण-शीर्ण हिंदू धर्म का त्याग कर दिनांक 14 अक्तूबर, 1956 को नागपूर में श्रद्धानंद पेठ मेंखास बनाए गए भव्य पंडाल में बौद्ध-धर्म की दीक्षा ली।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अपने लाखों अनुयायियों के साथ दिनांक 14 अक्तूबर, 1956 के दिन नागपूर में बौद्ध-धम्म को स्वीकार करने वाले हैं यह समाचार पूरे महाराष्ट्र में प्रसारित होते ही अस्पृश्य समाज में हड़बड़ी मच गई। वैसे देखा जाए तो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की घोषणा में विशेष कुछ नहीं था। 1935 में सभी अस्पृश्य बंधु धर्मांतरण करें इस आशय का प्रस्ताव डॉ. बाबासाहेब जिस संगठन के नेता थे उस संगठन ने जारी किया था। डॉक्टरसाहब भारत के केवल एक विद्वान व्यक्ति नहीं हैं, वरन् हजारों सालों से वर्णाश्रम धर्म द्वारा इंसानियत को धता बता कर दलित बनाई गई करोड़ों बहुजन जनता के जिम्मेदार नेता हैं। बहुजन समाज के लिए उनकी सहानुभूति केवल ओढ़ी हुई नहीं है। बहुजन समाज के लिए उनके मन में जो प्रेम और लगन है वह अपने को उनसे अलग मान कर सोचने वाले ‘अस्पृश्य समाज का उद्धार होना चाहिए’ विचार की तरह रजोगुण वाले अहंकार से पैदा नहीं हुआ। अस्पृश्य समाज के उद्धार का कार्य डॉक्टरसाहब ने पराएपन के भाव से कभी नहीं किया। वेखुद उसी समाज के हैं, इसलिए चातुर्वर्ण्य पर आधारित हिंदू धर्म में मानव की धीमी प्रगति के सभी नियमों के खिलाफ मानव पशु कैसे बनता जाता है यह

  1. प्रबुद्ध भारतः 13 अक्तूबर, 1956