342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 449

430 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उन्होंने बहुत करीब से देखा था। दुनिया में और कहीं भी इंसान को अस्पृश्य मानने का रिवाज नहीं है। पत्थरों में भी भगवान का साक्षात्कार पाने वाले भारत में ही हजारों सालों से उसके दर्शन होते हैं। हिंदू धर्म के ‘उच्च, उदात्त, विशाल’ दर्शन का अनुभव डॉक्टरसाहब को अथवा उनके हजारों अस्पृश्य बंधुओं को शायद ही कभी मिला हो। वास्तविक जीवन में अस्पृश्यों को न्याय, दया, करुणा का अनुभव अपवादस्वरूप ही मिलता है। समता का अनुभव पाने के लिए तो साक्षात् शारिरिक मृत्यु को ही अपनाना पड़ता है। सनातनियों का दावा है कि इससे आत्मिक समता की प्राप्ति होती है। बेचारे अस्पृश्य बंधुजनों की देह को जिंदा रहते हुए कभी समानता का अनुभव नहीं ही होता वरन् मृत्यु के बाद भी उसके पार्थिव को स्पृश्यों की स्मशानभूमि में जलाना भी संभव नहीं होता।

ऐसे हिंदु धर्म से अलग होने का निर्णय डॉ. अम्बेडकर ने 1935 में लिया। अस्पृश्यों को उनके इस निर्णय पर आश्चर्य क्यों होगा? उन्हें अगर अचरज होता ही है तो इस बात पर कि बाबासाहब ने यह निर्णय इससे पूर्व ही क्यों नहीं लिया? और निर्णय लेने के बाद भी 1956 तक डॉक्टरसाहेब क्यों रुके? अपने करोड़ों अनुयायियों की गंभीर जिम्मेदारी और इन अनुयायियों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सवालों के साथ जुड़ी हुई सारी उलझनों के कारण ही शायद डॉक्टरसाहब को यह निर्णय करने में इतनी देर लगी हो।

डॉ. अम्बेडकर के इस निर्णय को लेकर उनसे मतभेद हो सकते हैं। लेकिन इस निर्णय पर अमल करने को लेकर उन्हें जो देर हुई उसके विपरीत मतलब निकालना तो अधमता ही है। डॉक्टरसाहब के इस कार्य को ‘राजनीतिक स्टंट’ कहने वाले विद्वानों की भी कमी नहीं है। 14 अक्तूबर को नागपूर में इस तथाकथित स्टंट का असली रूप जिन्होंने देखा उनका इस कुत्सित समीक्षा को लेकर क्रोधित होना स्वाभाविक है और पांच लाख लोगों द्वारा बौद्ध धम्म की दीक्षा लिए जाने से ही उस समीक्षा का पोंगापन साबित हो चुका है। भगवान बुद्ध के बाद सनातन वर्णाश्रम धर्म पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने ही ऐसा करारा प्रहार किया इसके लिए प्रत्यक्ष इतिहास ही साक्ष्य है। इसीलिए, डॉ. बाबासाहेब के लाखों अनुयायियों के मुंह से आज एक ही नारा निकल रहा है -

‘बाबासाहेब करें पुकार!

बौद्ध धम्म का करो स्वीकार!’

अस्पृश्य समाज के तथा सवर्ण हिंदू समाज के लिहाज से भी इस युगांतरकारी सामाजिक घटना को प्रत्यक्ष घटित होते हुए देखने का अवसर मुझे मिला इसके लिए मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूं।

एक दिन पहले ही नागपूर पहुंचना बेहतर होगा सोच कर मैं 12 तारीख की रात को ही नागपूर एक्स्प्रेस से निकला। टिकटखरीदकर अंदर पहुंचा तो बोरीबंदर स्टेशन पर

खडि़या से लिखा एक बोर्ड मैंने देखा - ‘‘नागपूर के लिए स्पेशल ट्रेन रात सवा नौ बजे