342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 450

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चलेगी।’’ स्टेशन में हजारों की भीड़ जुटी थी। सबके मुंह से -

‘‘आकाश-पाताल एक करो

बुद्ध धर्म का स्वीकार करो’’

‘‘परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय’’

‘‘भगवान गौतम बुद्ध की जय’’

नारे गूंज रहे थे। महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, युवा सब हड़बड़ी में लग रहे थे। अस्पृश्य समाज के सुशिक्षित लोग - प्रोफेसर, डॉक्टर, वकील आपस में जोर-शोर से बौद्धिक चर्चाओं में लगे थे। अस्पृश्य समाज के सैंकड़ों रेल, गिरणी, मील महापालिका कामगार उत्साह के साथ नारे लगा रहे थे। उस समय देखा एक दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता। सठोत्तर की उम्र में पहुंची, हाथों पर कोहनी तक गोदना किए हुए और पल्लू को कमर पर साड़ी मेंखोंसे हुए एक मजबूत महिला एक युवति को हाथ पकड़ कर नागपूर एक्सप्रेस की ओरखींच कर ले जा रही थी। जाते हुए वह नारे भी लगा रही थी। हंस रही थी। पूछताछ करने पर पता चला कि यह महिला वड़ाला में रहती है। वहखुद, उसका बेटा और बहू यानी पूरा परिवार ही नागपूर जा रहा था - बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के लिए। कई कार्यकर्ताओं ने, समता सैनिक दल के लोगों ने उससे विनती की कि आप स्पेशल ट्रेन से चलिए लेकिन बुढि़या बिल्कुल नहीं मानी। आखिर बुढि़या ट्रेन में चढ़ी और डिब्बे के दरवाजे परखड़ी होकर नारे लगाने लगी।

स्टेशन पर आए अन्य लोगों की ओर भी मैं कौतुहल से देख ही रहा था। उनमें हो रही आपसी बातचीत ध्यान से सुन रहा था। एक पढ़ी-लिखी ब्राह्मण महिला नौकरी पर जा रहे अपने पति को विदा दे रही थी। नारों से वह पश्रेष्ठान लगी। कॉलेज जाने वाले कुछ युवक आपस में आंखों से ही शायद कह रहे थे - आज यह क्या नया ही चल रहा है? उनमें से ही एक नेखबर दी कि ‘‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर बौद्ध धर्म अपना रहे हैं।’’ फर्स्ट क्लास के डिब्बे के नजदीक कोई सम्माननीय कॉंग्रेस के नेताखड़े थे। नारे सुनते हुए उनके चेहरे पर शिकन थीं। उनके कुछ चाहने वाले उनके इर्दगिर्दखड़े थे। नेता उनसे बोले - ‘‘अरे बौद्ध बनिए या कुछ और बनिए, डॉ. अम्बेडकर ने चुनाव का समय ही इस काम के लिए चुना है, देखिए!’’

रेल के एक डिब्बे में शे. का. फे. के महाराष्ट्र के प्रमुख नेता और कार्यकर्ता बैठे थे। बड़े जोश से उनकी बातचीत चल रही थी। मुंबई के विधायक बी. सी. कांबले और के. आर. पवार वकील, पुणे के आयु. शंकररावखरात वकील, सिद्धार्थ कॉलेज के प्रोफेसर करडक, अहमदनगर के आयु. डी. टी. रूपवते वकील आदि लोगों को मैं सरसरी तौर पर पहचानता था। लेकिन उनकी बातचीत में रुकावट न आए इसलिए मैं अलग डिब्बे