342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 451

432 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में जाकर बैठा। गाड़ी में नींद कहां ले पाते। हर स्टेशन पर लोग आते। नारे लगातार लग रहे थे। कार्यकर्ता एक-दूसरे के गले मिल रहे थे। हंस रहे थे। उनके उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। मनमाड़ स्टेशन में तो इतनी भीड़ थी कि प्लॅटफॉर्म पर पांव रखने लायक जगह भी नहीं थी। गाड़ी में भी जगह नहीं थी। इसके बाद निकलने वाली स्पेशल ट्रेन से आइए कह कर कार्यकर्ता लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे थे। कुछ लोग उनकी सुन रहे थे कुछ बिना सुने ही डिब्बे में चढ़ रहे थे। नारे लगना जारी था।

तेरह तारीख को दोपहर सवा तीन बजे गाड़ी नागपूर स्टेशन पहुंची। स्टेशन परिसर में करीब 100 स्वयंसेवक थे। महाराष्ट्र शे. का. फे. के अध्यक्ष आयु. दादासाहब गायकवाड़

खुद स्टेशन पर हाजिर थे। स्वयंसेवक सबकाखयाल रख रहे थे। स्टेशन से बाहर निकलने में मुझे करीब बीस मिनट का समय लगा!

स्टेशन के बाहर हाथ में थैली लिए, बदन पर एक मैला कुर्ता पहने और सिर पर सिलवट भरी टोपी पहने हजारो लोग थे। पूछताछ करने पर पता चला कि आसपास के गांवों से हजारों लोग आए हैं। वे नागपूर की भाषा में बातचीत कर रहे थे। मैंने स्वयंसेवक से पूछा, उनके रहने का इंतजाम कहां किया गया है? उसने बताया, ‘‘गांव के सभी प्राथमिक विद्यालयों की इमारतों में ठहरने का उनके इंतजाम किया गया है। हालांकि वह इंतजाम काफी नहीं है ऐसा लग रहा है।‘‘

आपकी उम्मीद के अनुसार समारोह में हिस्सा लेने कितने लोग आएंगे?

‘‘यह कैसे बताएं? दो-चार लाख तो आएंगे ही।’’

मुंबई से आए स्वयंसेवकों में बेहतरीन अनुशासन दिखा। ऐसे समारोहों का शायद उन्हें अच्छा अनुभव था। स्टेशन से बाहर निकलते ही उनका अनुशासित ‘मार्च’ शुरू हुआ। बीच बीच में वे नारे भी लगा रहे थे। मैंने टैक्सी की और होटल में आकर अपना सामान रखा। नहाया और संवाददाता का पैड लेकर निकल पड़ा।

नागपूर शहर की तो काया ही पलट गई थी। जहां देखो वहां लोग थे। झुंड के झुंड चले जा रहे थे। चातुर्वर्ण्य के बाहर के जनता-जनार्दन का यहां पर ब्रह्मी विशाल स्वरूप मैं कभी नहीं भूल सकता। अपने असाधारण नेता की पुकार पर ये लोग नागपुर में जुट थे। अपने नेता की आज्ञा को वंदनीय और शिरोधार्य मानते हुए उनके पीछे-पीछे बौद्ध-धम्म की दीक्षा लेने का निश्चय उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था। वे गंभीर थे पर आनंदी थे। भारत के चारों कोनों से लोग नागपूर में इकठ्ठा हुए हैं। दूर से आने वाले लोग रेल, मोटरें, रिक्शा, बैलगाडियां आदि वाहनों का इस्तेमाल कर रहे थे। वाहनों के चालकों की आमदनी बढ़ गई थी। लेकिन मेरे अचरज ने तब सीमा लांघी जब मैंने देखा कि पुणे से पढंरपुर जाने वाले तीर्थयात्रियों की तरह लोग पुणे से पैदल नागपूर के