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लिए निकल पड़े थे। 75-100 कि.मी. की दूरी से भी ये लोग नागपूर पहुंच रहे थे, अपने पास जो भी था उसे बेच कर उन्होंने अपना जेबखर्च जोड़ा था। कई लोगों को गांव के लोगों ने चंदा जोड़ कर भेजा था। उनके उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। उनके ‘जय भीम’ और अन्य नारों में कोई रुकावट नहीं थी। किसी समय बौद्ध पंडित नागार्जुन के कारण पावन बना नागपूर शहर आज तमाम अस्पृश्य समाज का धर्मक्षेत्र बना था।
नागपुर शहर में वाहनों की कोई सुविधा नहीं। मुंबई की तरह मीटर लगी टैक्सियां नहीं हैं और पुणे की तरह ऑटोरिक्शे नहीं हैं। घंटे के हिसाब से टैक्सी लेनी पड़ती है और घंटेभर के तीन रुपए देने पड़ते हैं। टैक्सी ड्राइवर झगड़ने पर उतारू। अगर साइकिल रिक्शा लें तो पुणे-मुंबई के लोगों के बीच और गांव का वातावरण बुद्धमय होने के नाते वह शोभा नहीं देता। बुद्ध की जयकार के नारे आसपास लग रहे हों और एक आदमी हांफते हुए दूसरे को ढोकर ले जा रहा है यह कुल वातावरण के साथ मेलखाने वाला दृश्य नहीं। मैंने आखिर एक टैक्सी तय की और सभी दीक्षार्थियों के निवासों में जाने का कार्यक्रम तय किया। प्राथमिक विद्यालयों में इनका प्रबंध किया गया था। हर जगह स्वयंसेवक थे और वे पानी वगैरेह काम फुर्ती से कर रहे थे। कई लोग होटलों में जाकर कुछ खा लेते थे। तो कई जगहों पर तीन पत्थरों का चूल्हा जला कर महिलाएं रोटियां सेंकती हुई नजर आईं। कई जगहों पर दस-दस पांच-पांच लोगों के समूह बैठे-बैठे आपस में चर्चा करते हुए नजर आए। लेनिन ने कहीं कहा है कि जो बात सीखने के लिए वैसे सालोंसाल लग सकते हैं वही बात लोग क्रांति के दौरान कुछ दिनों में ही सीख जाते हैं। इन दो दिनों में नागपुर में आये लाखों लोगों ने दर्शन, धर्म, सामाजिक स्थितियां आदि के बारे में जितना ज्ञान पाया उतना उन्हें अब तक के जीवन में कभी नहीं मिला होगा, कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी।
अखंड चर्चा
स्थानों सभी में निरंतर चर्चा चल रही थी। कामगार-किसान वर्ग के ही ज्यादातर लोग थे और कितनी तरह से चर्चाएं चल रही थीं। कहीं बिल्कुल गंभीरता से, अब अपने गांव के लोग और ‘बामण’ क्या कहेंगे इस बारे में कहीं चर्चा चल रही थी। कहीं किसी बूढ़े आदमी के पंढरपूर की वारी के लिए जाने को लेकर कुछ युवक उनसे हंसी-मजाक कर रहे थे। कहीं युवा अपने साथ आए बूढ़े लोगों को इस बात की तसल्ली दे रहे थे कि अब अपने गांव के सभी भूत भाग जाएंगे। एक जगह तो एक युवक अपनी मां से हंस कर कह रहा था, ‘अब देखता हूं देवि तुम्हारे अंदर आती कैसे है!’ उसकी युवा बहन हंसते हुए उसका साथ दे रही थी। मां भी हंस कर आश्वासन दे रही थी कि अब इसके बाद मेरे अंदर देवी नहीं आएगी। 15-20 लोगों के समूह में, मैं स्वयंसेवकों की मदद से घुस गया और उनकी बातचीत में शामिल हुआ। एक कट्टर अम्बेडकरवादी युवक कहानी बता रहा था यह कहानी जैसे वह बता रहा था उसी तरह यहां प्रस्तुत करने का मोह मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं।