434 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘हमारे गांव के महारवाड़े के एक किनारे पर म्हसोबा है और दूसरे सिरे पर मरीआई है। हमने एक बार तय किया कि रात उठ कर जाएंगे और मरीआई को म्हसोबा के पास डाल कर आएंगे। हालांकि पहले हमारे गांव के ये लोग (कुछ बूढ़े पुरुष-महिलाओं की ओर इशारा कर) हमारे खिलाफ थे लेकिन हमने तो मजाक करना तय किया था। इसलिए हमने अफवाह फैलाई कि हमने मरीआई को उठा कर म्हसोबा के पास चल कर जाते हुए देखा है। उसका वर्णन किया। उसने किस तरह मलवट भरा था (पूरे माथे पर सिंदूर लगाना) वह भी बताया। महारवाड़े में उसका असर भी हुआ। उस रात मरीआई के दो-चार पत्थर उठा कर हम कुछ दूर चले थे तो हमें किसी की आहट सुनाई दी। मरीआई का पत्थर हमने वहीं छोड़ा और भागखड़े हुए। दूसरे दिन महारवाड़े में हंगामा हुआ। पंचाक्षरी आया और मंत्र बुदबुदाने लगा। इतने में हममें से एक के दिमाग में युक्ति आई और उसने कहा, अरे, मरीआई केवल रात में चलती है। उसे निकलने में देर हुई। थोड़ा चली होगी और सुबह हुई होगी। सुबह होते ही वह जहां थी वहीं पत्थर बन कर अहिल्या की तरह पड़ी रही।’’ कहानीखत्म हुई और सब खिलखिलाकर हंसने लगे। वृद्ध महिला और पुरुष भी हंसने वालों में शामिल थे। आखिर एक बूढ़े ने कहा, ‘‘अब गांव जाएंगे तो उस मरीआई को और म्हसोबा - दोनों को नदी में फेंक देंगे। अब बाबा की आज्ञा ही है। बाबा बताता है तो अपने को मरीआई की भी क्या जरूरत? और म्हसोबा की भी क्या जरूरत?’’
‘‘रिनाइजंस’’ को प्रत्यक्ष देखने का मौका मुझे मिल रहा था। इंसान बस सत्कर्मरत रहे, ईश्वर की उसे कोई जरूरत नहीं। ईश्वर कोई है नहीं, सब झूठ है। इस निर्णय को लाखों लोगों ने, सभी तरह के भ्रम पालने वाले भारतीयों ने स्वीकारा। यह क्या कोई साधारण बात है? जादू की छड़ी घुमाने से होने वाले असर की तरह डॉ. अम्बेडकर द्व ारा इस बात को सिद्ध किया गया है यह मुझे प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था।
इसके बाद मैंने पंडाल के बारे मेंखुद जाकर जानकारी की। नागपूर के दक्षिण अंबाजरी रोड पर अंध विद्यालय से परे पड़ने वाले फैले मैदान में बौद्धकालीन शिल्प के अनुसार भव्य स्तूपखड़ा किया गया था। लगभग 4 से 5 लाख लोग बैठ सकेंगे इतना भव्य पंडाल था।
इस पंडाल के सामने सड़क पर बायीं तरफ कतार में दुकानें सजी हुई थीं। बाकी समय उजाड़ पड़े रहने वाले इस मैदान में आज जैसे कोई मेला लगा हुआ था। पंडाल
खड़ा करने का काम पिछले आठ-दस दिनों से चल रहा था। सैंकड़ों अस्पृश्य बंधु उस जगह श्रमदान कर रहे थे। उनके श्रमदान से करीब 50-75 हजार रुपयों की बचत हुई ती। अब दीक्षा समारोह के लिए केवल 25-30 हजार रुपयों की रोकड़ का खर्च बैठने की बात समारोह के कार्यवाही से पता चली। वैसे दीक्षा समारोह पर करीब एक लाख रुपएखर्च होने का अंदाजा है। पता चला है कि, स्तूप जैसे मंच से डॉ. बाबासाहेब का दीक्षा समारोह संपन्न होगा वहां एक स्थायी स्मारक भी बनाया जाने वाला है।