435
नया धर्मक्षेत्र
नागपूर बहुजन समाज का नया धर्मक्षेत्र बनने वाला है अब यह साफ पता चलता है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के सामाजिक और राजनीतिक कार्य से नागपूर शुरू से जुड़ा रहा है। 1930 में नागपूर के पास कामठी में ही डॉक्टरसाहब ने संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र का विरोध कर विभक्त निर्वाचन-क्षेत्र की मांग की थी। पहला शे. का. फे. का अधिवेशन नागपूर में ही हुआ और डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर नागपूर में ही बौद्ध-धम्म की दीक्षा ले रहे हैं। नागपूर के पास ही रामटेक के पहाड़ पर बौद्ध महापंडित नागार्जुन की गुफा है। पुराने जमाने में यह क्षेत्र बौद्धों का तीर्थक्षेत्र था, अब एक बार फिर इस नगर को वही महत्व प्राप्त होना है। पंडाल के आसपास ही मुझे इस बात का पता चला कि डॉक्टरसाहब और उनकी सुविज्ञ पत्नी डॉ. माईसाहब अम्बेडकर आ चुके हैं और बर्डी के श्याम होटल में रुके हैं। डॉ. साहब को दीक्षा देने के लिए ‘‘काशिया’’ (प्राचीन इतिहास में कुशीनारा नाम से पहचाने जाने वाले) गांव से सुप्रसिद्ध ब्रह्मी बौद्ध भिक्षु चंद्रमणि महास्थविर आज नागपुर आए हुए हैं। उनके साथ और भी पांच-छह बौद्ध भिक्षु आए हुए हैं। 3 बजे के आसपास नारों की आवाज सुन कर मेरी नींदखुली।
खिड़की के पास जाकर मैं देखने लगा। रास्ते से इतने लोग जा रहे थे, वे चींटियों की तरह दिखाई दे रहे थे, वातावरण शांत दिखने लगा। गंभीर स्वरों में घोषणाएं की जा रही थीं। पंडाल में मौके की जगह पाने के लिए लोग जल्दी-जल्दी जा रहे थे। सुबह छह बजे मैं भी उस भीड़ में शामिल हुआ और पंडाल की ओर निकला। ज्यादातर लोगों ने साफ सफेद कपड़े पहने हुए थे। सभी को उस तरह की सूचनाएं दी गई थीं।
मैंने पंडाल में प्रवेश किया। मुंबई समता सैनिक दल ने बेहतरीन प्रबंध किए थे। कहीं भी किसी तरह की हड़बड़ी नहीं थी। श्रद्धा से भरे अंतःकरण से लोग पंडाल में प्रवेश कर रहे थे और स्वयंसेवकों द्वारा बताई जगह पर जाकर बैठ रहे थे। सुबह सात बजे ही आधा पंडाल लोगों से भरा हुआ दिखाई दिया। करीब दो-ढाई लाख लोग होंगे। संवाददाताओं में से अभी कोई नहीं आए थे। उनके लिए मंच के पास ही बैठने का प्रबंध किया हुआ था। लाऊडस्पीकर का बढि़या प्रबंध था। ऐसे कार्यक्रमों में होती हैं वैसी, ‘बच्चा या बच्चीखो गई है’ इस आशय की घोषणाएं लाऊडस्पीकर से की जा रही थीं। लोगों का आना लगातार जारी था।
इतने में लाऊडस्पीकर से एक महत्वपूर्ण घोषणा हुई। दीक्षार्थियों को प्रवेशपत्र दिए गए थे लेकिन संख्या इतनी बढ़ी कि प्रवेशपत्रखत्म हो गए। तब लाऊडस्पीकर से सूचना दी जा रही थी कि जो यह बताए कि दीक्षा लेनी है उसे पंडाल में प्रवेश दें और दीक्षार्थियों के साथ बैठाएं। लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। जनता के उत्साह के आगे किए गए सारे प्रबंध कमतर साबित हो रहे थे। लेकिन उसी उत्साह से सभी बातें ढंग से पूरी भी हो रही थीं।