342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 455

436 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानवी प्रेमभावना

स्तूप के आकार के विशाल मंच की ओर मैंने देखा। भगवान बुद्ध की धीरगंभीर प्रतिमा पूरी मानवजाति को अपना आशिर्वाद दे रही थी। डॉ. बाबासाहेब की प्रतिमा लाखों लोगों को उत्साह और आश्वासन दे रही थी। बौद्ध धर्म का झंडा शांति से हवा में फहरा रहा था। मंच पर भी भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा रखी हुई थी। उसके सामने अगरबत्तियां जल रही थीं। चंदन की सुगंध वातावरण को थोड़ा गंभीर बनाए हुए थी। इंसान-इंसान के और करीब आ रहा था। सबके मन में एक ही मानवता की भावना ऊंचान पर थी। दोस्त आपस में मिल रहे थे। एक-दूसरे का मुस्कान के साथ स्वागत कर रहे थे। क्रोध, द्वेष, जलन ये सब पंडाल से गायब हो गए थे। लाऊडस्पीकर से घोषणा की जा रही थी - ‘भगवान बुद्ध की जय।’

सुबह के नौ बज गए। लोगों के समूह में अभी बढ़ोतरी ही हो रही थी। मैदान लगभग पूरा भरा हुआ था। अखबारों के संवाददाता अंदाज लगाने लगे। सबकी यही राय थी कि करीब पांच लाख लोग वहां इकठ्ठा हुए थे। फिर सीटियां गूंजीं। एक ही हड़बड़ी मची। लाऊडस्पीकर से लोगों को शांति बनाए रखने की घोषणा लगातार दिए जा रहे थे। तीन-चार मोटरें मंच की ओर आ रही थीं। लाऊडस्पीकर से दी जा रही घोषणा मानने की मानसिक स्थिति में लोग नहीं थे। उस वक्त एक ही नारा सबके मुंह पर था - ‘परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय!’ ठीक सवा नौ बजे थे और मोटर से उतरे बाबासाहेब दो लोगों के कंधों पर हाथ डाले धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ रहे थे। ‘‘पुरःस्सर गदासवे झगड़ता तनु भागली’’ (संकटों से जूझते हुए शरीर थका) का वह मूर्तिमंत उदाहरण थे। लाखों लोगों के मन में एक ही विचार गूंज रहा था। डॉक्टरसाहब ने अपना शरीर तिल-तिल घिस कर अस्पृश्य समाज के लिए अच्छे हालात का प्रबंध किया था। डॉक्टरसाहब के दुश्मनों को भी यह बात माननी पड़ेगी। अब तक डॉक्टरसाहब और उनकी पत्नी मंच पर विराजमान हो चुके थे। नारों का पहला उफान गुजर चुका था। वातावरण फिर शांत हो चला था। और मुख्य समारोह की शुरुआत होने जा रही थी। डॉ. अम्बेडकर ने शुभ्र श्रेष्ठामी धोती पहनी थी और बदन पर शुभ्र सफेद शॉल थी। उनकी पत्नी ने भी शुभ्र वस्त्र धारण किए थे। शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के ज्यादातर नेता मुख्यतः मंच पर दिखाई दे रहे थे।‘‘ ख्6,

(धर्मांतर की ऐतिहासिक घटना के बारे में ऊहापोह करने वाला आयु. बी. सी. कांबले का लेख ‘प्रबुद्ध भारत’ में दिनांक 27-10-1956 को प्रकाशित हुआ था। उसे भी यहां देना अप्रस्तुत नहीं होगा - संपादक)

  1. नवयुगः मुंबई रविवार दिनांक 21 अक्तूबर, 1956