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उत्सुकता महसूस होना दो कारणों से स्वाभाविक माना जा सकता है। पहला कारण यह कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का दीक्षाविधि यानी उनके साथखड़े पांच करोड़ अस्पृश्य बंधुओं का दीक्षा विधि है इस गणित को मानकर चलने में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के अनुयायियों की निश के कारण कोई हर्ज नहीं यह बात वे जानते हैं। दूसरी बात यह कि, भारत में मजबूत जड़ें फैली लेकिन अब बिल्कुल सूख गई बौद्ध-धम्म की बेल भारत के प्रत्येक गांव में डॉ. बाबासाहेब के जो अनुयायी हैं उनकी दीक्षाविधि से ही फिर से पल्लवित हो सकती है यह भी वे जान चुके थे। इसलिए इस नजरिए से दुनिया भर के बौद्ध धर्मानुयायियों को डॉ. बाबासाहेब की बौद्ध-धम्म में दीक्षा के बारे में आकर्षण और उत्सुकता महसूस होना स्वाभाविक बात थी।
मूर्तिमान प्रज्ञा की प्राप्ति
हालांकि, कहने में हर्ज नहीं कि इसके अलावा उन्हें एक और बात का आकर्षण था। बौद्ध धम्म में प्रज्ञा का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। बौद्ध धम्म की शिक्षा में शांति, न्याय और प्रज्ञा इस तरह का क्रम है। बुद्ध यानि प्रज्ञावान। और प्रज्ञा का अर्थ है ज्ञानवान और जीवन से मुक्त! डॉ. बाबासाहेब की अलौकिक बुद्धमत्ता की ओर नजर डालने पर लगता है कि उन्हें मूर्तिमान प्रज्ञा कहना अत्युक्ति नहीं होगी। इस प्रकार के प्रज्ञावान व्यक्ति दुर्लभ होते हैं। लाखों या करोड़ों रुपएखर्च करने के बाद भी ऐसे व्यक्ति से उनकी राय या उनका समर्थन प्राप्त करना मुश्किल होता है। ज्ञान अपूर्व मूल्य की चीज है। विज्ञान का ज्ञान गुप्त रूप से स्पष्ट करने की बात अब सब जानते हैं। उसकी रक्षा के लिए कितने पहरे बैठाए जाते हैं। विदेशी राजदूतावासों में सलाह-मशविरे होते हैं। और ऐसे ज्ञानी लोगों को गुप्त तरीके से भगा ले जाने के लिए अकूत धन लुटाया जाता है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का ज्ञान अतुलनीय है। उनका मन के बारे में जो ज्ञान है वह मन की सूक्ष्म रचना के बारे में और मनुष्यत्व को पूर्णत्व की ओर ले जाने के लिए मन को सुसंस्कृत बनाने वाला ज्ञान है। दुनिया के किसी भी धर्मप्रसारक को मात दे सके ऐसा उनका ज्ञान है। इसलिए ऐसे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म को अपनाया है और अपना ज्ञान बौद्ध धर्म को समर्पित करने वाले बौद्ध धर्म के वे लगभग अकेले समर्थक बने हैं। आज के वह बुद्ध ही हैं। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की बौद्ध दीक्षा के कारण बौद्ध दुनिया के लिए अपूर्व ज्ञान समर्थक ऐन जरूरत के समय मिला है। इस नजरिए से भी सभी बौद्ध जनों के लिए डॉ. बाबासाहेब के ऊपर दिए गए अनुरोध के कारण बहुत हर्ष होना सहज है।
भारत की दलित जनता की प्रतिक्रिया अपरिमित आनंद की है।खासकर नागपूर और मुंबई तथा इन दो शहरों के बीच पड़ने वाले प्रदेश में उत्साह का मानो सागर ही लहराने लगा है। ‘प्रबुद्ध भारत’ दलितों का मानों अधिकृत गजट ही है। उसमें दि 29 सितंबर, 1956 और 13 अक्तूबर, 1956 के अंक में लगातार बौद्ध दीक्षा विधि कीखबर दलित