238 26-3-1946 बात राष्ट्रवाद की, कृति जातिवाद की - मुंबई - Page 46

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गया है। उनमें हिंदू ब्राह्मण हैं, ब्राह्मणेतर भी हैं, पारसी हैं, ईसाई हैं और मुसलमान भी हैं। इस बात की ओर सदस्यों का ध्यान दिलाते हुए मुझे बेहद खुशी है कि जिस समय इस कॉलेज को मान्यता दिलाने के लिए मुंबई विश्वविद्यालय के सामने अर्जी रखी गई उस वक्त बिना किसी आशंका के विश्वविद्यालय ने तुरंत मान्यता दी। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि इससे पूर्व विश्वविद्यालय के सामने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं आई थी। खासतौर पर कहने की विशेष बात यह है कि इस कॉलेज की स्थापना, अध्यापक वर्ग तथा अन्य व्यवस्था विश्वविद्यालय को इतनी पसंद आई है कि मुंबई विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज को आज तक पहले साल में ही सभी कक्षाएं चलाने की अनुमति नहीं मिली थी वह इस कॉलेज को पहले ही साल में दी गई है। कहने का तात्पर्य यही है कि किसी मायने में इस कॉलेज को ‘केवल अस्पृश्यों का कॉलेज’ नहीं कहा जा सकता। इस कॉलेज में प्रवेश, वजीफे और होस्टल में रहने की जगह आदि विशेष सुविधाएं अस्पृश्यों को उपलब्ध कराई जाएंगी। इस कॉलेज की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी यह मैं अब बताना चाहता हूं।

मुंबई प्रांत में छात्रों की संख्या में कितनी बेतहाशा वृद्धि हुई है इस बारे में शायद सदस्यों को जानकारी न हो। सामने बैठे मेरे मित्र गाडगिल को पता है कि पिछले ही साल एक ही साल में मुंबई विश्वविद्यालय को उन्नीस नए कॉलेज खोलने की अनुमति देनी पड़ी। इससे आप जान पाएंगे कि किसी कॉलेज में प्रवेश पाना छात्रों के लिए कितनी मुश्किल बात हो गई है। अस्पृश्य छात्र खासकर इस कठिन स्थिति से बहुत ज्यादा परेशान हैं। मैट्रिक पास करने के बाद अस्पृश्य छात्रों को किसी भी कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पा रहा। यही वजह थी कि अस्पृश्य छात्रों की मुश्किल की ओर मुझे सरकार का ध्यान दिलाना पड़ा और मैंने अस्पृश्य छात्रों की मुश्किल दूर करने वाली संस्था की स्थापना के बारे में बताया। इसलिए कहता हूं कि जिस ‘सिद्धार्थ कॉलेज’ की कल्पना और योजना के संदर्भ में आपत्तियां उठाई जा रही हैं उनमें कोई दम नहीं।

मेरे मित्रों ने एक और बात पर चर्चा के दौरान ध्यान दिलाया था। उन्होंने चर्चा का रुख राजनीति की ओर क्यों मोड़ा यह समझना मुश्किल है। हाल ही में हुए चुनावों के बारे में बोलते हुए मैं बुरी तरह लड़खड़ाया ऐसा उनका कहना है। यह कह कर उन्हें क्या हासिल हुआ यह तो वे वुद ही जानें, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें लगा होगा कि, भारत सरकार को मेरे कथन के साथ सहमत नहीं होना चाहिए था। जो हो, कहा यही जा रहा है कि मेरी हालत सूखे पौधे की तरह हुई है। उन विरोधियो से मैं यह कहना चाहता हूं कि यह वसंत ऋतु के आगमन से पूर्व की स्थिति है। मेरा आंदोलन अमर है।

चुनाव परिणामों के बारे में बोलते हुए मेरे मित्रों ने कहा कि अस्पृश्यों की सभी आरक्षित सीटें काँग्रेस ने जीत लीं। मैं उनसे यह पूछना चाहता हूं कि जिन तरीकों से ये