342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 460

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जाने की बात कही। इन संयुक्त कोशिशों के कारण मुंबई से एकखास रेलगाड़ी दिनांक 13 अक्तूबर, 1956. ख्8, के दिन बौद्ध दीक्षा विधि से पूर्व की रात छोड़ी गई। यह विशेष गाड़ीखचाखच भरी थी। 13 अक्तूबर, 1956 को रात नागपूर एक्सप्रेस द्वारा कर्नाटक से आए कर्नाटक शे. का. फे. के अध्यक्ष आयु. डी. ए. कट्टी और मुंबई से सिद्धार्थ कॉलेज के रजिस्ट्रार आयु. तलवटकर भी चले। उन्हें उसी गाड़ी में संयोग से नासिक के आयु. ए. जी. पवार वकील मिले। ‘नवयुग’ की ओर सेखास भेजे गए प्रतिनिधि भी इस ट्रेन से जा रहे थे। विशेष ट्रेन से मुंबई प्रदेश शे. का. फेडरेशन के महासचिव आयु. दहीविलकर बुवा, आयु. आर. जी.खरात, इसके अलावा मुंबई की वार्ड कमेटियों के अनगिनत कार्यकर्ता आए थे। सबका जिक्र इस जगह करना केवल असंभव है। इतनी प्रचंड भीड़ वहां थी।

यात्रा में गाड़ी से ये दीक्षार्थी लोग ‘बाबासाहेब करे पुकार बौद्ध धर्म का करो स्वीकार’ ‘भगवान बुद्ध की जय’, ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय’ ये और ऐसे नारे बार-बार दे रहे थे। जगह जगह के स्टेशन इन नारों से गूंज उठे थे। मुंबई से नागपूर तक रात-दिन जागृत जनता ही चली है ऐसा वह अभूतपूर्व दृश्य था। इन लोगों में माता-बहनों की संख्या करीब एक तिहाई थी। नागपूर रेलवे स्टेशन पर दिनांक 13 और 14 अक्तूबर, 1956 के दिन आने वाली सभी रेलगाडि़यां बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने की इच्छा रखने वालों से ही भर-भर कर आ रही थी।

नागपूर शहर के दक्षिण की ओर लगभग शहर के बाहर अंबाझरी नाम का रास्ता है। इस रास्ते से लगे करीब 14 एकड़ क्षेत्र का विस्तृत मैदान बौद्ध दीक्षा विधि के लिए तैयार किया गया था। इस मैदान के चारों ओर टाटों से अस्थायी चारदीवारी बनाई गई थी। मैदान के चारों ओर करीब 2000 से 3000 विद्युत्दीपों की (बल्बस्) व्यवस्था की गई थी। महिलाओं के लिए आधे हिस्से में छोटे पंडाल में अलग व्यवस्था की गई थी। पुरुषों के लिए मैदान का बचा हुआ पूरा हिस्सा था ही। नागपूर का अंबाझरी रोड बाकी समय तोखाली ही पड़ा रहता है लेकिन इस समारोह के कारण इस रोड पर अलग-अलग तरह की दुकानें सजी थीं। लाल हाफ शर्टस् पहने नागपूर के समता सैनिक दल द्वारा मैदान से पहले ही चार फर्लांग की दूरी तक के रास्ते का इंतजाम रखा गया था। मुंबई का समता सैनिक दल भी मैदान में उपस्थित समुदाय का खयाल रख रहे थे। इतनी भीड़ थी लेकिन मध्यप्रदेश के केवल 10-11 पुलिस वाले दिखाई दे रहे थे। शांति और व्यवस्था का सारा इंतजाम स्वयंसेवकों द्वारा ही किया गया था।

नागपूर का धमाल

नागपूर शहर दिनांक 14 की रात तीन बजे ही जाग गया कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। करीब 4 लाख लोग बाहर से आए हुए थे। उनकी रहने की व्यवस्था नागपूर शहर के जितने स्कूलों, हाइस्कूलों कीखाली इमारतों में (छुट्टियों के कारण ये इमारतेंखाली पड़ी थी)

  1. यह तारीख 12 अक्तूबर, 1956 होनी चाहिए - संपादक