342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 464

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पंचसीलानि

पाणातिपाता वेरमणि -

सिक्खापदं समादियामि।।1।।

अदिन्नादाना वेरमणि-

सिक्खापदं समादियामि।।2।।

कामेसु मिच्छाचारा वेरमणि

सिक्खापदं समादियामि।।3।।

मुसावादा वेरमणी -

सिक्खापदं समादियामि।।4।।

सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणि -

सिक्खापदं समादियामि।।5।।

अर्थ-

  1. मैं जीवहिंसा से अलिप्त रहने की प्रतिज्ञा लेता हूं।

  2. मैं चोरी करने से अलिप्त रहने की प्रतिज्ञा करता हूं।

  3. मैं कामवासना के अनाचार से अलिप्त रहने की प्रतिज्ञा करता हूं।

  4. मैं झूठ बोलने से अलिप्त रहने की प्रतिज्ञा करता हूं।

  5. मैं मदिरा तथा उत्तेजना में डालने वाले सभी पदार्थों के सेवन से अलिप्त रहने

की प्रतिज्ञा करता हूं।

बुद्ध के चरणों में

उसके बाद दंपति ने भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर कमलफूलों का हार अर्पण किया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपना मस्तक भगवान बुद्ध के चरणों में तीन बार रख कर वंदना की।

उसके बाद डॉक्टरसाहब ने कहा,

‘‘बहनों और भाइयों, हम दोनों ने आपके सामने भिक्खु चंद्रमणि के हाथों बौद्ध धम्म का स्वीकार किया है। भन्ते चंद्रमणि भारत के सबसे वरिष्ठ भिक्षु हैं। हमारा बौद्ध धम्म का अनुग्रह पाली भाषा में हुआ। उस अनुग्रह का मराठी में अनुवाद कर एक बार फिर अनुग्रह ले रहे हैं।’’ ख्12,

  1. प्रबुद्ध भारत - अम्बेडकर बौद्ध दीक्षा विशेषांक, 27 अक्तूबर, 1956, पृष्ठ क्रमांक 34