342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 469

450 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के दिनों की अदला-बदली होने से बहुत नुकसान नहीं हुआ है।

कई लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने इस काम के लिए नागपूर शहर को ही क्यों चुना? किसी और जगह यह कार्यक्रम क्यों नहीं किया? कुछ लोग कहते हैं कि आर एस एस की - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की- बड़ी पलटन नागपूर में होने के कारण उनके सीने पर सवार होकर इस काम को पूरा करने के इरादे से हमने इस सभा का आयोजन नागपूर में किया। इस कथन में कोई सच्चाई नहीं। इस कारण हमने यह कार्य नागपूर में नहीं रखा है। हमारा काम इतना बड़ा है कि जीवन का हर एक मिनट लगाने पर भी समय कम पड़े। अपनी नाकखुजा कर औरों को अपशगुन करने के लिए मेरे पास समय नहीं है।

इस जगह को चुनने के पीछे कोई और कारण है। जिन्होंने बौद्ध धम्म के बारे में पढ़ा हो वे जानते होंगे कि भारत में बौद्ध धम्म के प्रसार का काम नाग लोगों ने किया। नाग लोग आर्यों के भयंकर दुश्मन थे। आर्य और अनार्यों में भयंकर लडाइयां हुआ करती थीं और आर्यों द्वारा नागों को जला कर मार डाले जाने का जिक्र पुराणों में मिलता है। अगस्ती मुनी सिर्फ एक नाग मनुष्य को बचा पाए थे। हम सब उसी के वंशज हैं। जिन लोगों को इतनी मुसीबतें सहनी पड़ीं उन्हें फिर ऊपर आने के लिए किसी महापुरुष की जरूरत थी। उन्हें गौतम बुद्ध में वह महापुरुष मिला। भगवान बुद्ध का उपदेश नाग लोगों ने पूरे भारत में फैलाया। इसलिए हम नाग लोग हैं। नाग लोगों का प्रमुख स्थान नागपूर और उसके आसपास था ऐसा पता चलता है। इसीलिए इस शहर को ‘नाग-पुर’ यानी नागों का गांव कहा जाता है। यहां से करीब 27 मीलों की दूरी पर नागार्जुन का टीला है। पास से बहने वाली नाग नदी है। यानी, नदी का नाम यहां रहने वाले लोगों के नाम से पड़ा है। नागों की बस्ती से बहने वाली नदी नाग नदी बनी। इस स्थान को चुनने के पीछे असली वजह यही है। नागपूर को चुना इसीलिए। इसमें किसी को खिजाने का कोई इरादा नहीं था। ऐसी कोई भावना भी नहीं थी। आर. एस. एस. का कारण मेरे मन में दूर-दूर तक नहीं था। कोई ऐसा मतलब इससे बिल्कुल ना निकालें।

अन्य कारणों से हो सकता है विरोध महसूस हो। यह जगह विरोध के कारण चुनी नहीं गई है यह मैंने पहले ही साफ तौर पर बता दिया है। मैंने जो यह कार्य शुरू किया है उसके कारण कई लोगों ने और अखबारों ने मेरी कड़ी आलोचना की है। कुछ लोगों और अखबारों द्वारा की गई आलोचना कड़ी है। उनके मतानुसार मैं अपने गरीब-बिचारे अस्पृश्य लोगों को गलत दिशा में ले जा रहा हूं। आज जो अस्पृश्य हैं वे बाद में भी अस्पृश्य ही रहेंगे और अस्पृश्यों को मिले अधिकारों से बस वे वंचित रह जाएंगे ऐसा बता कर उन्हें बरगलाने की कोशिश की जा रही है। हममें जो अज्ञानी हैं उनसे पगडंडी से जाने के लिए कहा जाता है। हममें से कुछ युवा और बुजुर्गों पर उसका असर होता भी होगा। उसके कारण लोगों के मन में शक पैदा हुआ हो तो उस संशय को हटाना अपना कर्तव्य है और ऐसे शक को हटाना अपने संगठन की नींव को और मजबूत करना है।