342 14-15-10-1956 बौद्ध धर्म से ही दुनिया का उद्धार होगा - नागपूर - Page 470

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कुछ समय पूर्व हम लोगों ने मांस नखाने को लेकर एक आंदोलन किया था। उसके कारण स्पृश्य लोगों पर बड़ा संकट आया था। वे जिंदा भैंस का दूध पिएंगे और भैंस मरेगी तब उसे हम कंधों पर ढोकर ले जाएं, यह कैसा न्याय है? क्या यह विचित्र नहीं है? हम उनसे पूछते हैं कि तुम्हारी बुढ़ी माँ मरती है तब हम उसे क्यों नहीं ढोकर ले जा सकते? वे अगर मृत भैंस हमें देते हैं तो उन्हें मृत बुढि़या भी हमें ही देनी चाहिए। कुछ समय तक कोई आदमी ‘केसरी’ में विज्ञापन देकर हमारे लोगों को बरगलाने की कोशिश किया करता था। उसके द्वारा दिए गए विज्ञापनों में कहा होता था कि, फलां गांव में हर साल 50 मवेशी मरते हैं। उनके चमड़े की, सींगों की, हड्डियों की, मांस की, पूंछों की,खुरों की मिल कर कुल 500 रुपयों की कीमत मिलेगी। मृत मांस मिलेगा। मृत मांस छोड़ने से वे लोग इतनी बड़ी आय से भी वंचित हो जाएंगे। इस आशय का प्रसार उस दौरान केसरी में से हुआ करता था। वैसे तो उनके प्रसार का जवाब देने की जरूरत नहीं थी लेकिन हमारे लोगों को लगता कि इन बातों का हमारा साहब जवाब नहीं देता। इसलिए साहब आखिर करता क्या है?

एक बार मैं संगमनेर में सभा के लिए गया था। सभा के बाद शाम कोखाने का इंतजाम किया गया था। उस वक्त केसरी के उस संवाददाता ने मुझे एक चिठ्ठी भेजी और पूछा, ‘‘अजी आप अपने लोगों को मृत मवेशी न ढोने की सलाह देते हैं। उनके यहां किस कदर गरीबी है क्या आप जानते हैं ? उनकी पत्नियों के पास साड़ी-चोली नहीं, उनके पासखाने के लिए अनाज नहीं है, उनकी अपनीखेती नहीं है। उनकी ऐसी विपरीत स्थिति होने के कारण हर साल उन्हें मिलनेवाले सींगों के, मांस के करीब 500 रुपयों की उनकी आमदनी को छोड़ देने के लिए आप कह रहे हैं, क्या इसमें उन लोगों का नुकसान नहीं?’’

मैंने उनसे पूछा, आपके सवाल का जवाब मैं कहां दूं? यहां बरामदे में दूं या कि भरी सभा में दूं? लोगों के सामने ही सवाल-जवाब होना बेहतर है। मैंने उनसे यह भी पूछा कि आपका बस यही सवाल है या कोई और सवाल भी हैं? उन्होंने कहा, इतना ही पूछना है, बस इसी का जवाब दीजिए। मैंने उनसे पूछा, आपके कितने बाल-बच्चे हैं? उन्होंने बताया, मेरे पांच बच्चे हैं। भाई के भी 5/7 बच्चे हैं। मैंने कहा, इसलिए आपका परिवार बड़ा है। इसलिए आप और आपका परिवार मिल कर उस गांव के मरे मवेशियों को ढोएं और 500 रुपयों की आमदनी लें। आप यह फायदा जरूर लें। मैंखुद हर साल आपको अलग से 500 रुपए देने का प्रबंध करता हूं। मेरे लोगों का क्या होगा, उन्हें अनाज, वस्त्र मिलेगा या नहीं वह मैं देख लूंगा, आप इस मौके का फायदा जरूर लें। इतने बड़े फायदे की बात आप क्यों छोड़ रहे हैं? आप यह काम क्यों नहीं करते? इस काम को करने से अगर हमारा फायदा होता है तो आपका भी फायदा ही होगा, अगर नहीं क्यों नहीं? मरे हुए मवेशियों को आप ढोएं बेशक।’’

कल ब्राह्मण का एक लड़का आकर मुझसे बोला, पार्लियामेंट, एसेंब्लियों में आप लोगों