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सोच-विचार होना चाहिए। हिंदू धर्मत्याग का आंदोलन हमने 1935 में येवले में एक प्रस्ताव पारित कर हाथ में लिया। मैंने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि ‘हिंदू धर्म में मैं जन्मा हूं लेकिन इसी धर्म में रहते हुए मैं मरूंगा नहीं। कल मैंने दिखा दिया कि मैं सच बोल रहा था। मुझे इतनीखुशी हो रही है-आनंदातिरेक ही हुआ है लगभग। लगता है कि हमें नर्क से छुटकारा मिला है। मैं अपने कोई अंध भक्त नहीं चाहता। जो बौद्ध धर्म को अपनाना चाहते हैं उन्हें जागरुकता के साथ उसे अपनाना चाहिए, उन्हें वह धर्म सही लगना चाहिए।
मनुष्य के उत्कर्ष के लिए धर्म बहुत जरुरी बात है। मैं जानता हूं कि कार्लमार्क्स को पढ़ कर एक पंथ का निर्माण हुआ है उनकी राय में धर्म की कुछ हैसियत नहीं। वे धर्म को महत्वपूर्ण नहीं मानते। उन लोगों को सुबह ब्रेकफास्ट (नाश्ता) मिला, उसमें पाव, मलाई, मक्खन, मुर्गी की टांग आदि होने से, दोपहर में पेटभर भोजन मिला, आराम की नींद मिले, फिल्म देखने को मिले तो बस्स। उनका दर्शन बस यही है। लेकिन मेरी राय उनसे अलग है। मेरे पिता गरीब थे। इसलिए ऐसा सुख मुझे नहीं मिला है। किसी ने जीवन में उतनी मेहनत नहीं की होगी जितनी मैंने की है। इसीलिए, सुख-संतोष के बगैर इंसान का जीवन कितना कष्टमय होता है मैं जानता हूं। आर्थिक उन्नति के लिए आंदोलन की जरूरत है यह मैं मानता हूं। मैं ऐसे आंदोलन के खिलाफ नहीं हूं। इंसान को आर्थिक उन्नति प्राप्त करनी ही होगी।
लेकिन मेरी राय में और इसमें एक महत्वपूर्ण फर्क है। भैंसा, बैल और मनुष्य में फर्क है। भैंसे और बैल को हर रोज चारे की जरूरत होती है। मनुष्य को भी अन्न की जरूरत होती है। दोनों में फर्क यह है कि भैंसे या बैल के पास मन नहीं है। मनुष्य के पास शरीर के साथ मन भी है। इसलिए उसे दोनों के बारे में सोचना होगा। मन का विकास होना चाहिए। मन सुसंस्कृत बनना चाहिए। उसे सुसंस्कारित बनाना चाहिए। जिस देश के लोग यह कहते हैं किखाना न हो तो मनुष्य सुसंस्कृत नहीं हो सकता उस देश के साथ अथवा उन लोगों के साथ ताल्लुक रखना भी मुझे पसंद नहीं। जनता से संबंध रखते हुए मनुष्य का शरीर जिस प्रकार निरोग होना चाहिए उसी प्रकार सुदृढ शरीर के साथ मनुष्य का मन भी सुसंस्कारित होना चाहिए। वरना मानव जाति का विकास हुआ है ऐसा कहा नहीं जा सकता।
मनुष्य का शरीर या मन क्यों रोगी बनता है? क्योंकि, या तो उसे शारीरिक पीड़ा होती है अथवा उसके मन में उत्साह नहीं होता। मन में उत्साह न हो तो प्रगति कैसे होगी? उत्साह न होने के क्या कारण होते हैं? पहला कारण यही कि मनुष्यों को ऐसे रखा गया है कि उन्हें ऊपर आने का मौका ही नहीं मिलता या उसे प्रगति की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। फिर उसके मन में उत्साह कहां से आएगा? वह रोगी बन जाता है। जिस व्यक्ति को अपनी कृति का फल मिलता है उसे उत्साह होता है। वरना पाठशाला में शिक्षक कहने लगे कि, कौन है रे ये? ये तो महार है। और ये महार पहली श्रेणी में परीक्षा पास करेगा? उसे पहली श्रेणी चाहिए