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में बोलना था। मैंने कहा, अगर आप गुस्सा न हों तो मुझे एक सवाल पूछना है। मैं अकेला क्या 50 ग्रैज्युएटस् की बराबरी का हूं या नहीं? उन्हें यह बात माननी ही पड़ी। मैंने उनसे पूछा, बताइए इसकी वजह क्या है? उन्होंने कहा, कारण हमें पता नहीं है। मैंने कहा कि मुझमें इतनी विद्वत्ता है कि मैं राजमहल के शिखर पर जाकर बैठ सकता हूं। मुझे, मेरे जैसे ही लोग चाहिएं। क्योंकि, शिखर से सब दूर निगरानी की जा सकती है। हमारे लोगों की रक्षा करनी हो तो इस प्रकार शिकार करने वाले लोग का निर्माण होने चाहिए। क्लर्क टाइप के लोग क्या करेंगे? लिनलिथगो को मेरी बात सही लगी। उस साल 16 बच्चों को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए भेजा गया। यह बात अलहदा है कि कुछ मटके कच्चे होते हैं कुछ पक्के उसी तरह उन 16 में से कुछ कच्चे निकले कुछ पक्के। आगे राजगोपालाचारी ने इस योजना को रद्द कर दिया।
हमारे देश में ऐसे हालात हैं जो हमें हजारों सालों तक निरुत्साही बना कर रख दें। जब तक ऐसी स्थितियां हैं तब तक अपनी उन्नति के बारे में उत्साह होना संभव नहीं। इस बारे में इस धर्म में रह कर हम कुछ नहीं कर सकते। मनुस्मृति में चातुर्वर्ण्य के बारे में बताया है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था मनुष्यमात्र की प्रगति के लिए अत्यंत घातक है। मनुस्मृति में लिखा है कि शूद्र केवल सेवा-चाकरी करें। उन्हें शिक्षा क्यों चाहिए? ब्राह्मण शिक्षा लें, क्षत्रिय शस्त्र धारण करें। वैश्य व्यापार करें और शूद्र इन सबकी चाकरी करें। समाज की इस व्यवस्था को कौन बदलेगा? ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग के लोगों का कुछ तो फायदा है। शूद्रों का क्या? तीन वर्णों को छोड़ दें तो बाकी लोगों में उत्साह कैसे पैदा हो? चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था ऐसे ही लागू नहीं हुई है, वह रूढि़ नहीं, वह धर्म है।
हिंदू धर्म में समता नहीं है। एक बार मैं गांधी से मिलने गया था तब उन्होंने कहा, मैं चातुर्वर्ण्य को मानता हूं। मैंने उनसे कहा, आप जैसे महात्मा चातुर्वर्ण्य मानते हैं! लेकिन यह चातुर्वर्ण्य कौन से और कैसे? (हाथ के पंजे की उंगलियां एक के ऊपर एक आएंगी इस प्रकार पकड़ कर) ये चातुर्वर्ण्य उलटे हैं या कि सीधे? चातुर्वर्ण्य की शुरुआत किस तरफ से और अंत किस ओर? गांधी ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया और देते भी क्या? जिन लोगों ने हमारा नाश किया उनका भी इसी धर्म के कारण सफाया होगा। हिंदू धर्म पर मेरा यह यूं ही लगाया गया आरोप नहीं है। हिंदू धर्म के कारण किसी का भी उद्धार नहीं होने वाला है। वह धर्म ही बरबाद (तबाह) धर्म है।
हमारा देश बार-बार विदेशियों के कब्जे में क्यों गया? 1945 तक यूरोप में लडाइयां जारी थीं। जितने सैनिक मरते थे उतने ही भरती से फिर आगे आते। उस वक्त कोई भी यह नहीं कह सका कि हमने लड़ाई जीती। हमारे देश की हर बात ही निराली! क्षत्रिय मरें तो हमखत्म। हमें अगर हथियार धारण करने की अनुमति होती तो यह देश परतंत्र होता। कोई भी इस देश को जीत नहीं पाता।