456 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिंदू धर्म में रह कर किसी का उद्धार नहीं होगा। हिंदू धर्म की रचना के अनुसार इसमें उच्च वर्णों को फायदे हैं यह बात सही है, लेकिन औरों का क्या? ब्राह्मण महिला की जच्चगी होती है तो उसकी नजर हाइकोर्ट में कहां जज की जगहखाली है यह ढूंढती है। हमारी जाडूवाली बाई जच्चगी हो तो उसकी नजर झाडूवाले की जगहखाली है उसी तरफ जाती है। ऐसी विचित्र व्यवस्था हिंदू धर्म की वर्णव्यवस्था ने की है। इसमें सुधार तो क्या होंगे? उत्कर्ष केवल बौद्ध धर्म में ही हो सकता है।
बौद्ध धर्म में 75 प्रतिशत ब्राह्मण भिक्षु थे और 25 प्रतिशत शूद्रादि। लेकिन भगवान बुद्ध ने बताया, ‘‘हे भिक्षुओं, आप अलग-अलग देशों से और जातियों से आए हैं। अपने प्रदेश से नदियां बहती हैं तो वे पृथक-पृथक होती हैं लेकिन सागर में मिलने के बाद वे अलग-अलग नहीं रहतीं। वे एक हो जाती हैं और समान हो जाती हैं। बौद्ध धर्म संघ सागर की तरह है। इस संघ में सब समान हैं।’’ सागर में जाने के बाद यह गंगा का पानी, यह महानदी का पानी इस प्रकार अलग-अलग पहचान संभव नहीं है। उसी प्रकार बौद्ध संघ में आने के बाद जाति समाप्त हो जाती है। सभी लोग समान बन जाते हैं। इस प्रकार समता बताने वाला एक ही महापुरुष है और वह है भगवान बुद्ध। (तालियों की गूंज)
कुछ लोग पूछते कि आपने धर्मांतर करने में इतनी देर क्यों की? इतने दिनों तक आप क्या कर रहे थे? यह महत्वपूर्ण सवाल है। धर्म समझाना आसान काम नहीं। एक आदमी का यह काम नहीं। धर्म के बारे में काम करने वाले किसी भी आदमी की समझ में यह बात आ जाएगी। मुझ पर जितनी जिम्मेदारी है उतनी दुनिया के किसी भी व्यक्ति पर नहीं है। अगर अधिक उम्र मिले तो जितना सोचा है उतना सारा काम मैं करूंगा। (बाबासाहेब चिरायू हों के नारे)
कुछ लोग कहेंगे कि महार बौद्ध होंगे तो क्या होगा? मैं उनसे कहूंगा कि ऐसा ना कहें। ऐसा कहना उनके लिए जोखिम भरा साबित होगा। उच्च और संपन्न वर्ग को धर्म की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। उनमें से अधिकारी लोगों के पास रहने के लिए बंगला है। उनकी सेवा के लिए नौकर-चाकर हैं। उनके पास धन-संपत्ति है, उन्हें सम्मान मिलता है। ऐसे लोगों के लिए धर्म के बारे में सोचना या चिंता की जरूरत नहीं है।
धर्म की जरूरत गरीबों को है। पीडि़त लोगों को धर्म की आवश्यकता है। गरीब मनुष्य आशा के सहारे जीता है। Hope! जीवन की जड़ आशा में ही है। आशा ही
खत्म हो तो जीवन कैसे रहे? धर्म आशावान बनाता है। पीडि़तों को, गरीबों को संदेश देता है - डरना मत! सब ठीक होगा। जीवन आशावान बनेगा। इसलिए गरीब और पीडि़त लोग धर्म से चिपके रहते हैं।
यूरोप में जब ईसाई धर्म ने प्रवेश किया तब रोम तथा आसपास के देशों की हालत बहुतखस्ता थी। लोगों को पेट भरखाना भी नसीब नहीं होता था। उस समय गरीब