458 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरा कारण यह है कि, अगर धर्म का प्रसार करने वाले विद्वान न हों तो धर्म को ग्लानि आती है । ज्ञानी व्यक्तियों द्वारा धर्म का ज्ञान दिया जाना चाहिए। विरोधियों से तर्क-वितर्क करने में धर्म के प्रचारक सिद्ध न हों तो धर्म को ग्लानि आती है।
तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह कि धर्म और धर्म का दर्शन विद्वानों के लिए होते हैं। प्राकृत और सामान्य लोगों के लिए मंदिर होते हैं। वे वहां जाकर अपनी श्रेष्ठ विभूतियों की पूजा करते हैं।
बौद्ध धर्म स्वीकार करते समय हमें इन बातों का ध्यान रखना होगा। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त कालिक यानी केवल कुछ काल के लिए हैं ऐसा कोई नहीं कह सकता। आज दो हजार पांच सौ सालों के बाद भी बुद्ध के सभी सिद्धान्तों को सारी दुनिया मानती है। अमेरिका में दो हजार बौद्ध संस्थाएं हैं। इंग्लैंड में तीन लाख रुपयों की लागत से बौद्ध विहार बना है। जर्मनी में भी तीन-चार हजार बौद्ध संस्थाएं हैं। बुद्ध के सिद्धान्तो अजर-अमर हैं। हालांकि, यह ईश्वर का धर्म है ऐसा बुद्ध ने कोई दावा नहीं किया है। बुद्ध ने बताया मेरे पिता प्राकृत थे, मेरी माता प्राकृत स्त्री थी। अगर आपको लगे तभी इस धर्म को स्वीकार करें। आपकी बुद्धि को अगर ठीक लगे तभी इस धर्म को आप स्वीकार करें। ऐसी उदारता अन्य किसी धर्म में बरती नहीं गई है।
बौद्ध धर्म की नींव क्या है? अन्य धर्मों में और बौद्ध धर्म में बहुत फर्क है। अन्य धर्मों में बदलाव नहीं आने वाला है। क्योंकि वे धर्म मानव और ईश्वर के बीच का संबंध बताते हैं। अन्य धर्मों का कहना यह है कि ईश्वर ने सृषि् का निर्माण किया। ईश्वर ने आकाश, वायु, चंद्रमा, तारे, सूरज सभी का निर्माण किया। ईश्वर ने हमारे लिए कुछ निर्माण करना बाकी नहीं रखा। इसीलिए ईश्वर की पूजा करें। ईसाई धर्म बताता है कि मृत्यु के बाद एक दिन - Day Of Judgement - होता है और उस दिन निर्णय के अनुसार सब कुछ घटित होता है। भगवान और आत्मा को बौद्ध धर्म में कोई जगह नहीं। भगवान बुद्ध ने बताया - दुनिया में सब जगह दुख है। 90 प्रतिशत लोग दुख से पीडि़त हैं। उन दुख से पीडि़त, गरीब लोगों को दुख से मुक्त करना बौद्ध धर्म का प्रमुख कार्य है। कार्ल मार्क्स ने बुद्ध से अलग क्या बताया? भगवान ने जो कुछ बताया वह आड़े-तिरछे तरीके से नहीं बताया।
और भाइयों, मुझे जो कुछ कहना था मैंने कह दिया यह धर्म सभी तरह से परिपूर्ण है। उसमें कहीं कोई लांछन नहीं है। हिंदू धर्म का जो सिद्धांत है उससे उत्साह पैदा ही नहीं हो सकता है। हजारों सालों से कल-परसों तक हमारे समाज से एक भी व्यक्ति ग्रॅज्युएट या विद्वान नहीं बन पाया था। कहने में मुझे हर्ज नहीं होता कि हमारे स्कूल में झाडू लगाने का काम एक महिला करती थी। वह मराठा थी। वह मुझे नहीं छूती थी। मेरी मां मुझे बताती कि बड़े लोगों को मामा कहा करो। पोस्टमैन को मैं मामा कहता था। (हंसी के फव्वारें) बचपन में एक बार स्कूल में मुझे प्यास लगी थी। मैंने अध्यापक