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से कहा। अध्यापक ने कहीं और से चपरासी को बुलाकर उसे मेरे साथ भेजा और कहा कि इसे नल पर ले जाओ। हम नल के पास पहुंचे। चपरासी ने नलखोला और मैंने पानी पिया। मुझे स्कूल में पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता था। आगे मुझे डिस्ट्रिक्ट जज की नौकरी दी गई थी। लेकिन मैंने उस बला को अपने गले पड़ने नहीं दिया। मैंने नौकरी नहीं की क्योंकि मेरे सामने सवाल था कि अगर मैं नौकरी करूं तो मेरे भाइयों के लिए कौन काम करेगा। इसीलिए मैं नौकरी के बंधन में नहीं बंधा।
निजी तौर पर मेरे लिए कोई बात असंभव नहीं है। (तालियां) आपके सिर पर वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण इस प्रकार जो रचना है वह कैसे टूटेगी यह असली सवाल है। इसीलिए इस धर्म का सभी प्रकार का ज्ञान आप लोगों को करवाना मेरा कर्तव्य है। मैं किताबें लिख कर आपकी आशंकाएं दूर करूंगा। ज्ञान की पूर्णावस्था तक आप लोगों को ले जाने की पूरी कोशिश करूंगा। कम से कम आज आपको मुझ पर विश्वास रखना होगा।
हालांकि, आप लोगों पर भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आपके बारे में लोगों को आदर महसूस हो, सम्मान इस प्रकार आपके कार्य होने चाहिएं। इस धर्म के रूप में हम अपने गले में एक लाश बांध रहे हैं ऐसा ना सोचें। बौद्ध धर्म के नजरिए से फिलहाल भारत की भूमि शून्यवत् है। इसीलिए हमें श्रेष्ठ तरीके से धर्म का पालन करने का निश्चय करना होगा। महार लोगों ने इस धर्म को निंदाजनक हालत तक पहुंचाया ऐसा नहीं होना चाहिए। इसीलिए आपको निश्चय करना होगा। अगर हम यह कर सकें तो अपने साथ अपने देश का, इतना ही नहीं दुनिया का उद्धार करेंगे। क्योंकि बौद्ध धर्म के कारण ही दुनिया का उद्धार होने वाला है। दुनिया में जब तक न्याय नहीं मिलता तब तक शांति नहीं रहेगी।
यह नई राह जिम्मेदारी भरी है। हमने संकल्प लिया है। कुछ इच्छा पाली है। युवकों को यह बात ध्यान में रखनी होगी। वे केवल पेट पालने वाले न बनें। अपनी कमाई का कम से कम 20वां इस कार्य के लिए दें, ऐसा आश्वासन दें। हिस्सा मैं इस काम के लिए दूंगा ऐसा वे निश्चय करें। मैं सबको साथ लेकर चलना चाहता हूं। तथागत ने पहले कुछ व्यक्तियों को दीक्षा दी। उन्हें आदेश दिया कि इस धर्म का प्रसार कीजिए। उसके अनुसार यश और उसके 40 मित्रों ने बोद्ध धर्म की दीक्षा ली। यश अमीर घराने से था। उन्हें भगवान ने धर्म कैसा है यह बताया - ‘‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, लोकानुकंपाय, धम्म आदि कल्याणं, मध्य कल्याणं, पर्यावसान कल्याणं’’ उस जमाने के हालात के अनुसार तथागत ने अपने धम्म के प्रकार का मार्ग बनाया। अब हमें भी कोई आयोजन करना होगा। इसलिए समारोह के बाद हरेक को दीक्षा दे। मैं घोषित करता हूं कि प्रत्येक बौद्ध व्यक्ति को औरों को दीक्षा देने का अधिकार है।’’ ख्16,
- प्रबुद्ध भारत, अम्बेडकर बौद्ध दीक्षा विशेषांक, 27 अक्तूबर, 1954