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के आरक्षण के बारे में सोचा गया। काँग्रेस के लोगों को आरक्षित जगहों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र रखना पसंद नहीं था। कई लोगों को लगता था कि इस पर अमल कर देखा जाना चाहिए। कहते हैं चोर की लंगोटी भी छोड़नी नहीं चाहिए। उसी प्रकार आरक्षित सीटें बिल्कुल ही छोड़ देने के बजाय उनका संयुक्त चुनाव क्षेत्र द्वारा उपयोग किया जाना चाहिए ऐसा लगा। लेकिन अब तक ऐसे अनुभव हो चुके हैं कि काँग्रेस के टिकट पर आरक्षित जगहों पर जो लोग आते हैं वे अपना मुंह बंद कर बैठते हैं। इस प्रकार अगर संयुक्त चुनाव क्षेत्रों से गधे लोग ही चुन कर आने हों तो आरक्षित सीटों का और चुनावों का मतलब ही क्या है? अनुभव हमें बताता है कि उनसे कोई फायदा नहीं मिलता है।
फेडरेशन ने प्रस्ताव रखा है कि आरक्षित सीटें नहीं चाहिएं। उनके प्रस्ताव से मैं चिपके रहना चाहता हूं। उस प्रस्ताव से मैं डिगना नहीं चाहता। आरक्षित सीटें केवल 10 सालों के लिए हैं। इस बार के चुनावों के बाद अब वे सीटें आरक्षित नहीं रहेंगी। हमारे समाज की एकता किसी भी बात से अधिक महत्वपूर्ण है। आरक्षित सीटें दोयम हैं।
आज तक की हमारे फेडरेशन वाले आंदोलन ने आत्मविश्वास जरूर पैदा किया है। फेडरेशन के लिए यह बात गौरवपूर्ण है। उसी के कारण संगठन बन पाया। हालांकि, उसके साथ ही साथ एक तरह की गुटबंदी भी बनी। संयोगवश से हमारी जनसंख्या बहुत कम है। हम केवल अल्पसंख्य ही हैं। ऐसे हालात में फेडरेशन की इस स्थिति को बनाए रखना मुश्किल है।
इसके लिए हमारे दुख को जानने वाले अन्य कौन लोग हैं यह जानना होगा। ऐसे सभी लोगों को साथ में कर, उनके साथ आगे चलने के लिए हमारा तैयार होना जरुरी है। मैं ऐसे लोगों को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी कोशिश अगर कामयाब हुई तो हमें नई पार्टी की स्थापना करनी पड़ेगी। उस दल में हमारे अलावा दूसरों के लिए भी दरवाजेखुले रहेंगे।
आपही में नहीं वरन् इस पूरे देश में ही एक विचित्र विकृति दिखाई देती है। लोगों को लगता है कि आज पौधा रोपते ही कल उसके फलखाने के लिए मिलने चाहिएं। राजनीति में ऐसी उम्मीद करना गलत है।
इंग्लैंड की राजनीति का उदाहरण लीजिए। वहां की ब्रिटिश लेबर पार्टी का इतिहास क्या बताता है? साल 1900 में उनके केवल दो लोगों ने पार्लियामेंट का चुनाव जीता था। 1906 में उन्हें करीब 14 सीटें मिलीं। 1924 तक उन्हें कोईखास कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन उसी साल उनके 125 लोग चुनाव जीते और सही मायने में विरोधी पार्टी बनी। इसप्रकार राजनीति धीरज और बल काखेल है। जिनके पास दम नहीं, जिनके पास धीरज नहीं वे राजनीति नहीं कर सकते।
अब समाज के अन्य लोगों के साथ काम करना आप लोगों को सीखना होगा। आपस