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दुनिया का मार्गदर्शन करेगी ऐसी प्रत्येक की धारणा है। शांति और अहिंसा का भारत तथा भारत से बाहर प्रचार करने वाले सम्राट अशोक के अशोकचक्र को हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर स्थान प्राप्त हुआ है। उसी महान सम्राट द्वारा स्वीकार किए गए बौद्ध धर्म की आप दीक्षा ले रहे हैं। भारत की शांति और अहिंसा नीति का प्रकाश आप समूचे विश्व में प्रसारित करेंगे इसका हमें यकीन है। परमेश्वर आपको दीर्घायु प्रदान करे!
विनीत,
महापौर और सदस्य
नागपूर महापालिका ख्1,
नागपूर
दिनांक 15-10-1956
प्रशस्ति पत्र पढ़ने के बाद महापौर ने बाबासाहेब को पुष्पमाला अर्पण कर उनका सम्मान किया।
प्रशस्ति पत्र पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-
‘‘नागपूर कॉर्पोरेशन के मेयर, कार्पोरेटर्स और उपस्थित नागरिकों,
नागपुर शहर और इस प्रांत के साथ मेराखास संबंध नहीं है। मेरा राजनीतिक संबंध भी नहीं है। इस प्रांत के साथ मेरा इतना ही संबंध है कि यहां मेरे कुछ लोग रहते हैं। इस प्रांत के लिए मैंने कोईखास बात नहीं की है। मैं म्युनिसिपालिटी का सदस्य नहीं था। इसलिए म्युनिसिपल कामकाज के बारे में मैं आपको उपदेश नहीं दे सकता। (हंसी) इस अवसर पर दो शब्द किस विषय पर सुनाऊं, इस बारे में मैं सोच रहा हूं। इस बारे में सोचते हुए मुझे लगता है कि म्युनिसिपालिटी के कामकाज और देश के कामकाज में बहुत अधिक समानता है_ इसलिए, इस प्रसंग में मैं आपको देश के कामकाज के बारे में दो शब्द कहना चाहूंगा।
भारत में मेरे जैसे विद्वान हैं लेकिन आपने अभिनंदनपत्र भेंट कर मेरा गौरव किया यह आपकी उदारता है। भारत के संविधान को लागू होकर पांच साल बीत चुके हैं। आप सभी को इस बारे में सोचना चाहिए कि यह संविधान चलता कैसे है? बाहरी तौर पर आपको लगेगा कि, हमारी और अंग्रेजों की शासन प्रणाली कुछ हिस्सों का अपवाद छोड़ कर लगभग एक सी है। वहां वयस्क मतदान पद्धति चलती है, हमारे देश में भी यही प्रणाली लागू है। उस देश में पार्लियामेंट है, हमारे देश में भी पर्लियामेंट है। उस देश की पार्लियामेंट में बहुमत से निर्णय लिए जाते हैं, हमारे पार्लियामेंट में भी बहुमत से ही निर्णय लिए जाते हैं। इसके बावजूद उस देश के प्रशासन में एक फर्क जरूर दिखाई देता
- प्रबुद्ध भारतः अम्बेडकर बौद्ध दीक्षा विशेषांक,ः 27अक्तूबर, 1956