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उम्मीदवार को चुनने का अधिकार चुनावक्षेत्र को ही होता है। अगर ऐसा नहीं है तो उसे प्रजातंत्र नहीं कहा जा सकता। इंग्लैंड में पार्टी ही नेता का और मंत्री का चुनाव करती है। हमारे यहां नेता अपने सहयोगी चुनने के अधिकार की मांग करता है और उस पर शान से अमल भी करता है। यहखुलेआम चल रही तानाशाही है_ इसीलिए आज काँग्रेस सत्ता में है। जिस प्रकार यहां का कामकाज चलता है और आपखुद काँग्रेस के हाथ में सारे सूत्र सौंपते हैं उसके आधार पर आपको साफ तौर पर किसी के द्वारा बताए जाने की जरूरत है कि आप मूर्ख हैं। (तालियां) भारत कहां जा रहा है?
फिलहाल काँग्रेस की राजनीति में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जा रही है। महिलाओं की इस काँग्रेसी राजनीति के बारे में कुछ समझ नहीं आ रहा। स्वधर्म छोड़ कर महिलाएं राजनीति करते हुए घूमें इसके जैसी शर्म की बात कोई और नहीं। महाराष्ट्र की महिलाओं द्वारा अब केवल ‘कासोटा’ (महाराष्ट्री ढंग से साड़ी पहनते हुए नौ गज की साड़ी का पीछे की ओरखोंसा गया सिरा। इसकेखुलने से एक तरह से साड़ीखुल जाती है। व्यंजनार्थ है - लाज-शरम या मर्यादा का त्याग करना)खोलना ही बाकी रह गया है। काँग्रेस द्वारा 292 महिलाओं को लोकसभा में लेने का निर्णय लिया गया है। महिलाएं विधानसभा में जाएंगी तो पुरुष क्या करेंगे? दिन भर लोकसभा में रहने के बाद जब फाइलें बगल में दबाए महिलाएं घर लौटेंगीं तब क्या उनके पति टेबिल पर भोजन रखेंगे? ये महिलाएं दिन भर पार्लियामेंट-एसेंब्ली में जाएंगी और शाम को घर लौटने के बाद पति से पूछेंगी - अजी सुनते हो, मैं पार्लियामेंट से आ गई हूं। घर का सारा कामकाज हुआ है कि नहीं?’ ये महिलाएं पार्लियामेंट में जाएंगी और उनके बच्चे कौन सम्हालेगा? एक बच्चा रो रहा है, दूसरे की नाक बह रही है, तीसरा कहीं चला गया है - कौन इन बच्चों का
खयाल रखेगा? यह सब उलटा हो रहा है। यह उलटी दुनिया है। अच्छा, पार्लियामेंट में जाकर ये महिलाएं करती क्या हैं? इस बारे में कुछ कहने में मुझे शरम आती है। उनके बारे में बताने का मेरा इरादा नहीं था, लेकिन अब बता ही देता हूं। (हंसी)।
उनकी नीति पूरी तरह सेखत्म हो चली है। मेरे पास कुछखत आए हुए हैं। उन
खतों का मजमून तो प्रधानमंत्री के बारे में है।खत लिखने वाली महाराष्ट्रीयन महिला है यह बड़े शर्म की बात है। उसनेखत में तो नेहरू का जिक्र करते हुए हमारे ये, हमारे वो कहते हुए कहा है कि वे ये करेंगे, वो करेंगे आदि-आदि। मैं कैबिनेट में था तब मुझे बड़ौदा की एक महिला केखत आते थे। उसमें वह मुझे ‘भाऊजी’ (देवर या जेठ) कहती है। जवाहरलाल नेहरू को शायद वह अपना पति मानती हैं। दो-तीनखत मैंने जला दिए। एकखत रखा है। मेरे इस्तीफा देने के बाद नेहरू द्वारा मुझे जो पार्टी दी उसमें नेहरू अजीब लोगों के साथ घुल-मिल रहे थे यह देख कर मैंने उनकी कोट की बाजू कोखींच कर उनका ध्यान अपनी तरफ किया और अपने पास काखत उन्हें दिखाया।