344 15-10-1956 राजनीति में भक्ति अगर विभूती पूजा की जगह लेती है तो तानाशाही निर्माण होने का खतरा पैदा हो जाता है - नागपूर - Page 488

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इस बारे में मैंने पार्लियामेंट में आखिरी बार भाषण दिया था, जिसमें मैंने इसकी मीमांसा की थी। राजनीति में भक्ति को भक्तिपूजा का रूप प्राप्त होता है। उससे तानाशाही के निर्माण होने का डर होता है। इसीलिए उस वक्त मैंने इशारा किया था कि हमें बहुत अधिक जागरुक रहना होगा। चमत्कार भरी बातों को गैर-जरूरी महत्व दिया जाता है। गटर का पानी पीने वालों को गटर में ही ब्रह्म दिखाई देता है।

उसी को महासाधु कहा जाता है। हमारे देश में ऐसी ही पूर्व परंपरा चली आ रही है।

जमीन के टुकड़े इकठ्ठे करता है, कंकड-पत्थर इकट्ठा करता है, क्या है उसका नाम? (श्रोताओं में से आवाज आती है - विनोबा भावे), हां, वही विन्या। क्या इकट्ठा किया है उसने? एकतरफ नाक बहती है और वह भाषण देता है। देश की राजनीति से उसका क्या ताल्लुक? पार्लियामेंट किसलिए है? उसके लिए पार्लियामेंट क्यों नहीं कर देते? ये आदमी जगह- जगह घूम कर भूदान के लिए जमीनें इकट्ठी कर रहा है। अगर इतना ही इनका कौतुक हो तो लोग उन्हें ही प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाते? विनोबा भावे प्रधानमंत्री बनें और देश का जमीनों से संबंधित सवाल हल करें। वरना यह बेकार में लड़ाई करवाना छोड़ दें। असल में यह न काँग्रेस का, न भावे का काम है ऐसा हो गया है।

इस देश में बाबाओं के पीछे लोग पागल हैं। किसी आदमी ने कुछ विचित्र किया तो वह चमत्कारी पुरुष बन जाता है। लेकिन अगर किसी ने साफ कपड़े पहने, पीने के लिए साफ पानी चाहिए कहा तो उसे घमंडी कहा जाता है।

यह देश ऐसी अजीब सोच के बीच फंसा हुआ है, इसीलिए सबको जागरुक रह कर ऐसे मामलों को रोकना चाहिए।

हमने नया संविधान बनाया है। इस नए तरीके के बारे में हमें तर्जुबा नहीं है। बेहद सावधानीपूर्वक अगर उसे लागू नहीं किया गया तो इस देश का विनाश होगा। केवल सफेद टोपियों से काम नहीं चलेगा। पूरे राष्ट्र को बैठ कर राजनीति का अध्ययन करना होगा। ऐसा नहीं कि केवल जवाहरलाल नेहरू को ही अकल मिली है। जवाहरलाल से अधिक बुद्धिमान बहुत लोग हैं। मैं पांच सालों तक कैबिनेट में था। मुझे पांच सालों तक का अनुभव प्राप्त है। अब मेरे देखने लायक बाकी कुछ नहीं बचा है। हफते में एक बार मैं काँग्रेस की बैठक में उपस्थित रहा करता था। जवाहरलाल को अच्छे जांच कर देखा है। उसका सिर बस पोले कद्दन्न् की तरह है। मैं पूरी तरह से संतुष् हूं।

उसका सिर बस पोले कद्दन्न् की तरह है। उससे अधिक कुछ भी नहीं। जवाहरलाल की नाक सीधी है, रंग सुंदर गोरा है, इसलिए उसका महत्व अधिक होता हो तो बात अलग है। लेकिन शारदा नाटक में बताये गए अनुसार ऐसा व्यक्ति ‘लड़की को अच्छा वर