238 26-3-1946 बात राष्ट्रवाद की, कृति जातिवाद की - मुंबई - Page 49

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हूं। जो भी पढ़ने लायक है वह सब मैं पढ़ चुका हूं। उसमें मैंने पाया कि गांव-गांव में हर रोज अस्पृश्यों पर होने वाले अन्याय-अत्याचार के संदर्भ में किसी भी सदस्य द्वारा सदन में एक भी सवाल नहीं उठाया गया है। किसी रिपोर्ट में यह पढ़ने में नहीं आया, ऐसा कोई प्रस्ताव आज तक सदन पटल पर नहीं रखा गया है, जिसमें कहा गया हो कि अस्पृश्यों के लिए कुछ किया जाना चाहिए। वैसे, अपवादस्वरूप 1933 में सामने बैठे कुछ सदस्यों ने अस्पृश्यता हटाने के कुछ प्रयास किए थे। मंदिर प्रवेश के संदर्भ में एक बिल रखा गया था। वॉइसरॉय ने जब उसे मान्यता देने से इनकार किया तब बहुत ह८ा मचा था। इस बिल को पारित नहीं किया गया तो आत्महत्या करने की धमकी भी कई सदस्यो ने दी थी। लेकिन जब बिल को मान्यता दी गई तब क्या हुआ क्या आप जानते हैं?

बिल वापिस लिया गया। रंगा अय्यर की हालत देखने लायक थी क्योंकि उन्होंने ही वह बिल सदन के सामने रखा था। साथियों ने दगा दिया तो वे भड़क गए। उन्होंने अपने साथियों को खूब गालियां सुनाईं आखिरकार बेचारे को मुंह की खानी पड़ी। मुझे याद है कि दो बार और अस्पृश्यों से संबंधित सवालों का जिक्र हुआ था। पहला, 1916 में माणेकजी दादाभाई ने ‘अस्पृश्यों की समस्याओं के बारे में एक पूछताछ समिति नियुक्त करने’ के बारे में प्रस्ताव रवा था। उस वक्त आज की इस चर्चा की शुरुआत करने वाले गोविंद मालवीय के पिता ने ही उस प्रस्ताव का घोर विरोध किया था। दूसरा प्रसंग साल 1927 का है। स्व. लॉर्ड बर्नहेड ने उस वक्त कहा था कि अस्पृश्य अल्पसंख्यक होने के कारण उन्हें संविधान के तहत सुरक्षा प्रदान की जाए। लेकिन....

जब-जब हम खुद लड़ाई छेड़ कर अपने अस्तित्व के बारे में लोगों को अहसास कराते हैं तब तब उन्हें हम पर बहुत दया आती है। हम जब- अलग चुनाव क्षेत्र की मांग करते हैं, नौकरियों में निश्चित अनुपात में आरक्षण की, शिक्षा के लिए ग्रँट की मांग करते हैं तभी हिंदुओं को पता चलता है कि हम भी जिंदा हैं, वरना वे हमें मरा हुआ ही मान कर चलते हैं। बाकी समय वे लोग हमें पूछते तक नहीं, हम उनकी गिनती में कहीं नहीं ठहरते। हमें अपने सामाजिक और राजनीतिक हक देने से इनकार करते हुए वह कहते हैं, कि आप तो हिंदू ही हैं। यही बंधुभाव व्यक्त करते हुए अगर अपनी जेब से कुछ जाने वाला हो तो तब हम उनके ‘चाचा के मामा के भतीजे के भांजे’ बन जाते हैं। कुछ भी वर्च न होने वाला हो, उनका फायदा होने वाला हो तब हम उनके भाई होते हैं, वहा रे वाह इनका बंधुत्व!

आखिर में बस इतना ही कहता हूं, और खास तौर पर जोर देकर कहता हूं कि हिंदुओं की दी हुई भिक्षा पर जीने की अब हमारी बिल्कुल भी इच्छा नहीं है। उनका दान-धर्म हमें नहीं चाहिए। हम इस देश के वासी हैं। सरकारी खजाने पर जिस प्रकार अन्य जातियों का अधिकार है वैसे ही हमारा भी अधिकार है। हमें गुलामी में रहने पर