239 25-6-1946 हम शायद आज लड़ाई हारे लगें लेकिन युद्ध हम जरूर/निश्चित जीतेंगे - मुंबई - Page 50

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मजबूर करने वाली, हमारी नैतिकता भ्रष्ट करने वाली भीख हमें नहीं चाहिए। हम अपने योग्य अधिकारों के लिए ही लड़ रहे हैं। हमें वे मिलने ही चाहिए और, मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर हमारी न्याय की लड़ाई का विरोध किया गया तो खून बहाकर भी हम अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लेंगे।

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हो सकता है आज हम लड़ाई हारे हों, लेकिन, युद्ध में जीत हमारी

ही होगी

25 जून, 1946 के दिन फ्रंटियर मेल ने धड़-धड़ करते हुए शाम 4.15 को मुंबई सेंट्रल स्टेशन में प्रवेश किया। उसी समय हजारों लोगों की आवाजें स्टेशन परिसर में गूंजने लगीं। जब समुद्र अपनी मर्यादा त्यागकर अनियंत्रित हो जाता है और तूफान की स्थिति पैदा हो जाती है, वैसे ही उठे तूफान का शोर था। स्टेशन परिसर में स्वागत के लिए इकठ्ठा हुए 80000 महिला-पुरुष कार्यकर्ताओं के भव्य जनसमुदाय की वह आवाज थी। खुशी के कारण होश खो बैठने से धक्कमपेल मची, लोग एक-दूसरे को ठेलने लगे। सुबह सात बजे से भूख-प्यास की परवाह किए बिना बैठे उस जनसमुदाय को अचानक अपने उद्धारक का अहसास हुआ और उनके चेहरे खिले हुए कमल की तरह दिखाई देने लगे। उनके मन भर आए और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। शोरगुल हुआ तथा भीड़ ने गंभीर, प्रदीर्घ नारे लगाना शुरू किए।

समता सैनिक दल के 5000 तेजस्वी वीर, रेल पुलिस और उनके अधिकारी उस जनसमुदाय को व्यवस्थित करने में असमर्थ दिखाई दिए।

ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी श्री बापूसाहब पी. एन. राजभोज, मुंबई प्रांत शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के अध्यक्ष दादासाहब बी. के. गायकवाड़ तथा मुंबई की जनता के प्रिय नेता एडवोकेट आर. डी. भंडारे और बाबासाहेब के चिरंजीव भाऊसाहब यशवंतराव अम्बेडकर ने आगे चल कर बाबासाहेब अम्बेडकर रेल के खास डिब्बे से उतरे तब उनका स्वागत किया।

सड़क के दोनों किनारों पर खड़े समता सैनिक दल के सैनिकों से सलामी लेते हुए उनके बीच से जब डॉ. बाबासाहेब बाहर निकल रहे थे तब कई लोग आशिर्वाद पाने के लिए उनके पैरों पर गिर रहे थे। एडवोकेट भंडारे एकदम सामने थे और दल के

जनताः 13 जुलाई, 1946