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बुद्धं शरणं गच्छामि!

दिनांक 16 अक्तूबर, 1956 को महाराष्ट्र के चंद्रपूर में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के हाथों दीक्षा समारोह होना तय हुआ था। उस कार्यक्रम के लिए बाबासाहब, माईसाहब, नानकचंद रत्तू और बॅ. राजाभाऊखोब्रागडे 16 अक्तूबर के दिन सुबह 5 बजे नागपूर से निकले। चंद्रपूर से देवाजीखोब्रागडे और ज. गो. सन्त गुरुजी पहले ही पहुंचे थे। उन्होंने बाबासाहेब के ठहरने की व्यवस्था स्थानीय सरकारी रेस्ट हाऊस में की थी। वहां उन्होंने थोड़ी देर आराम किया। उसके बाद दोपहर के समय गंतव्य सीधे चंद्रपूर के सर्किट हाऊस पर बाबासाहेब आए। तब दोपहर के चार बजे थे।

दीक्षा पंडाल में और बाहर लाखों लोग उपस्थित थे। शाम 7 बजे बाबासाहेब नियोजित धम्म दीक्षा स्थल पर पहुंचे। उनके दाहिने हाथ में लाठी थी। उनके मंच पर आते ही लाखों लोगों ने उठ कर उनका स्वागत किया। बाबासाहेब की जयकार से वातावरण गूंज उठा। लोगों के स्वागत का बाबासाहेब ने हाथ उठा कर स्वीकार किया। उसके बाद लाठी के सहारे वे कुर्सी में बैठे।

बुद्ध प्रतिमा के आगे मोमबत्ती और अगरबत्ती जलाई गई। बुद्ध प्रतिमा पर फूल चढ़ाए गए। उसके बाद कई संस्थाओं की ओर से बाबासाहेब को फूलमालाएं अर्पण की गईं। लाखों लोग दीक्षा ग्रहण करने के लिए सफेद वस्त्र धारण कर आए थे। उस समय बताया गया कि चंद्रपूर के बाजार से सफेद वस्त्र हीखत्म हो गए थे। सफेद वस्त्र धारण किए हुए महिलाओं और पुरुषों के चेहरे पर उत्साह और आनंद दिखाई दे रहा था।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने उपस्थित लोगों को ‘‘बुद्धं सरणं गच्छामि...’’ यह त्रिसरण-पंचशील और 22 प्रतिज्ञाएं दीं। धम्मदीक्षा इस प्रकार दी गई। इस प्रकार चंद्रपूर में दो-तीन लाख लोगों ने बाबासाहेब के हाथों धम्म दीक्षा ली।

मैंने बोधिसत्व डॉ. आंबेडकर को देखाः भिक्षु सुमेध पृ. 114-116