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फार्मोसा, फ्रान्स, जर्मनी, हाँगकाँग, हंगरी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया, लदाख, लैटिविया, लाओस, मलाया, नेपाल, पाकिस्तान, पेनांग, फिलिपीन्स, स्वीडन, सिक्कीम, सिंगापूर, थाइलैंड, तिब्बत, युनाइटेड किंगडम, यूएसए, यूएसएसआर और उन देशों के प्रतिनिधि, विशेष आमंत्रित मेहमान, बौद्ध भिक्षु, बौद्ध भिक्षुणियां, ऑब्जर्वर्स आदि को मिला कर करीब 400 आमंत्रित विदेशी प्रतिनिधि उपस्थित थे। काठमांडू के भव्य तुडखेल ग्राऊंड पर यह समारोह होना था। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने आज भारतीय ढंग के कपडे पहने थे- वुलन की पैंट, बंद गले का कोट, और सिर पर बफ रंग की कढ़ाई वाली टोपी।
बौद्ध धर्मीय लोगों की चौथी विश्व परिषद सफल हो की कामना व्यक्त करने वाले तीस देशों ने और संस्थाओं ने अपने संदेश भेजे थे। इन संदेशों के पढ़ने के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा-
मैं अपने देश से या अपनी संस्था की ओर से संदेश लेकर नहीं आया हूं। इस देश में - नेपाल में, बुद्ध का जन्म हुआ। लेकिन 2500 सालों के बाद बौद्ध धर्म गायब हो गया है। बौद्ध धर्म का वृक्ष अभी है। उसके पत्ते सूख गए हैं लेकिन उसकी जड़ सूखी नहीं है। मुझे यकीन है कि उसमें पानी देने से वह बढ़ेगा। इसीलिए मैं यहां संदेश लेकर नहीं आया हूं। लेकिन मैंने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकारा यह मैं आपको बताना चाहता हूं। क्योंकि, उसमें समता, बंधुभाव और आजादी है। अन्य धर्मों में ईश्वर और आत्मा के अलावा कुछ नहीं। मनुष्यमात्र की उन्नति के लिए कारण बनने वाले इन तीन कारणों का अन्य धर्मों में समावेश नहीं किया गया है। दुनिया में दुख भरा है इस तथ्य पर बौद्ध धर्म का आधार टिका हुआ है। ईश्वर और आत्मा पर नहीं। दुनिया में मनुष्य दुखी है इस दर्शन पर वह आधारित है। इतना ही नहीं, उस दुख का निवारण करना और उसके निवारण का मार्ग दिखाना धम्म का अंतिम लक्ष्य है ऐसा भगवान ने बताया है। जो धर्म इस कसौटी पर नहीं उतरेगा उसे धर्म नहीं कहा जा सकता ऐसा भगवान ने अपने पहले सूत्र में - धम्मचक्र प्रवर्तन में- बताया है। उनके अलावा इस प्रकार किसी धर्म के संस्थापक ने बताया नहीं है। इस कारण मैंने बौद्ध धर्म स्वीकारा है। दुख निवारण के लिए बुद्ध ने प्रज्ञा पारमिता बताई है।
उनके बाद नेपाल के प्रधानमंत्री आयु. टंका प्रसाद आचार्य ने समारोह में आए मेहमानों का स्वागत भाषण किया। उनके बाद गवर्नमेंट कमेटी के अध्यक्ष और नेपाल महाराज के प्रमुख निजी सचिव आयु. लोक दर्शन का स्वागत भाषण हुआ। उनके बाद नेपाल के राजा वीर विक्रम सहदेव का नाम अध्यक्ष पद के लिए और भिक्षु चंद्रमणी का नाम धर्मशासक पद के लिए घोषित किया गया। उसके बाद नेपाल के राजा का भाषण हुआ।
सभा के आखिर में महाथेरो भिक्षु चंद्रमणी का भाषण हुआ। आखिर नेपाल के राजासाहब ने सबके प्रति आभार प्रकट किया और बैंड पर नेपाल का राष्ट्रगीत बजाने के बाद उस दिन की सभा का कामकाज सम्पन्न हुआ। ख्3,
- प्रबुद्ध भारत, 24 नवंबर 1956