347 20-11-1956 बुद्ध या कार्ल मार्क्स - काठमांडू - Page 493

474 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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बुद्ध या कार्ल मार्क्स

“ काठमांडू की विश्व बौद्ध परिषद के समापन से पूर्व डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों को सम्बोधित करने हेतु विशेष भाषण 20 नवंबर, 1956 के दिन रखा गया था। भाषण नेपाल के वैभवशाली राजदरबार में था। भारत में लोप होने के बाद कई सालों तक बौद्ध धर्म नेपाल में अपने पूरे चरम पर था, लेकिन आज वहां मनुप्रणित विषमता पर आधारित हिंदू धर्म कानूनी तौर पर जारी रखा गया है। ऐसे देश में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता के बारे में भाषण देना यह एक अपूर्व क्रांतिकारी घटना थी। इस भाषण में बौद्ध धर्म की ओर देखने का अपना मौलिक दृष्टिकोण उन्होंने स्पष्ट किया।’’ ख्1,

दिनांक 20 नवंबर, 1956 के दिन विश्व बौद्ध परिषद के आखिरी दिन विश्व बौद्ध परिषद के अध्यक्ष डॉ. जी. पी. मलालशेखर (सिलोन) ने बाबासाहेब से विनती की कि वे ‘बौद्ध धम्म में अहिंसा का स्थान’ विषय पर भाषण दें। डॉ. बाबासाहेब ने उनकी विनती स्वीकार की लेकिन विश्व बौद्ध परिषद के बहुसंख्य प्रतिनिधियों ने आग्रह किया कि बाबासाहेब बुद्ध या कार्ल मार्क्स विषय पर भाषण दें। बाबासाहेब ने इसी विषय पर भाषण देने की बात मानी। विश्व बौद्ध परिषद के समापन समारोह का आरंभ दोपहर 3 बजे होने वाला था। तदनुसार कुछ समय पूर्व बाबासाहेब निर्धारित स्थान पर पहुंचे। बाबासाहेब के आते ही विश्व बौद्ध परिषद के पूर्व अध्यक्ष और ब्रह्मदेश सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ऊ चॉन टून और उनकी पत्नी बाबासाहेब को आदरपूर्वक भव्य मंच की ओर ले गए। बाबासाहेब को सभी उपस्थित प्रतिनिधियों ने सम्मानपूर्वक अभिवादत किया बाबासाहेब कुर्सी पर बैठे। मंच पर नेपाल के राजा महेंद्र वीर विक्रम सहदेव एक सजाई गई कुर्सी पर विराजमान हुए। पड़ोस में पूज्य चंद्रमणि महास्थविर, जी. पी. मलालशेखर, पूज्य अमृतानंद महास्थविर और ऊ चान टून ने स्थान ग्रहण किया। पहले पूज्य चंद्रमणि ने उपस्थित महानुभावों त्रिशरण और पंचशील दिया। उसके बाद विश्व बौद्ध परिषद के अध्यक्ष डॉ. जी. पी. मलालशेखर ने कहा-

‘‘आज की विश्व बौद्ध परिषद में भगवान बुद्ध की भारत भूमि से एक महान पुरुष आया है। उसका नाम है डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (तालियों की बरसात) उन्होंने नागपूर में पांच लाख दलित लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा देकर महान धम्मक्रांति की है। आज इस विश्व बौद्ध परिषद में संपूर्ण विश्व के बौद्ध प्रतिनिधियों की ओर से मैं उनका हार्दिक

  1. प्रबुद्ध भारतः 3 अगस्त, 1956