347 20-11-1956 बुद्ध या कार्ल मार्क्स - काठमांडू - Page 494

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स्वागत करता हूं।’’ इसके बाद उन्होंने रंगबिरंगी फूलों की बहुत बड़ी माला बाबासाहेब के गले में पहनाई। बाद में बाबासाहेब से भाषण देने की विनती की गई।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरखड़े हुए और एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट हुई। सविताबाई बाबासाहेब के पीछेखड़ी हुईं। कैमरों ने फटाफट तस्वीरेंखींचीं और फिर धीरगंभीर आवाज में बाबासाहेब ने ‘बुद्ध या कार्ल मार्क्स’ इस विषय पर अपना ऐतिहासिक भाषण दिया-

उन्होंने कहा-

‘‘सम्माननीय अध्यक्ष महोदय आदरणीय भिक्षुगण और सज्जनों,

विश्व बौद्ध परिषद के बहाने नेपाल में आने के बाद भी परिषद के कामकाज में प्रतिनिधि की तरह भाग नहीं ले पाया इसके लिए मैं बहुत क्षमाप्रार्थी हूं। आज मैं यहां उपस्थित तो हूं लेकिन शारीरिक तौर पर मेरे बीमार होने के कारण परिषद के कामकाज की गतिविधियाँ और परेशानियाँ मुझसे बर्दाश्त नहीं होने वाली हैं इसका अहसास प्रतिनिधियों को होगा इसका मुझे यकीन है। परिषद का अनादर करने के लिए मैं गैरहाजिर नहीं रहा। अपने स्वास्थ्य के कारण मैं परिषद के कामकाजादि कर्तव्यों में पूरा नहीं उतर पाऊंगा इसी कारण मैं उपस्थित नहीं रह सका। शायद परिषद में गैरहाजिर रहने के कारण हुए नुकसान को भर देने के लिए ही आज भरी दुपहरी में भाषण के लिए मुझसे कहा गया है। भाषण के लिए मैंने हामी तो भरी है लेकिन यहां उपस्थित होने के बाद ही मुझ पर यह जिम्मेदारी अचानक सौंपी गई है। आप लोगों के सामने भाषण देना पड़ेगा इसका मुझे बिल्कुल पूर्वाभास नहीं था। मैं किस विषय पर बोलूंगा इस बारे में पूछे जाने पर ‘बौद्ध धम्म की अहिंसा’ विषय मैंने सुझाया था। लेकिन मुझसे कहा गया है कि परिषद के बहुसंख्य लोगों को लगता है कि सरसरी तौर पर मैंने जिस विषय का जिक्र किया था उसी विषय पर यानी ‘बौद्ध धम्म और साम्यवाद’ पर मुझे बोलना चाहिए। इसलिए भाषण का विषय बदलने की भले मैंने अनुमति दी हो लेकिन ईमानदारी के साथ मुझे यह बताना पड़ेगा कि अचानक यह विषय दिए जाने के कारण इतने महान और विस्तृत विषय पर बोलने की मेरी कोई तैयारी नहीं है। यह विषय केवल महान और विस्तृत ही नहीं है वरन् बेहद जटिल भी है। इस जटिल विषय के दबाव में आधे से अधिक दुनिया फंसी है। इतना ही नहीं वरन् बौद्ध राष्ट्रों के युवा छात्र भी इस विषय से अभिभूत हो चुके हैं। यह दूसरा मसला मुझे बेहद चिंताजनक लगता है।

साम्यवाद की जीवनप्रणाली जो बताती है उससे बौद्ध धम्म द्वारा बताई गई जीवनशैली बेहतर है ऐसी प्रशंसा जब तक बौद्ध राष्ट्र की युवा पीढ़ी नहीं करती तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि बौद्ध धर्म का भविष्य उज्जवल है। बौद्ध धर्म की श्रद्धा दो पीढि़यों तक भी नहीं टिक सकती। इसीलिए जिनका बौद्ध धर्म पर दृढ़ विश्वास है उन्हें युवा पीढ़ी को बौद्ध धर्म की महत्ता के बारे में यकीन दिलाना होगा। साम्यवाद का पर्याय बौद्ध धर्म