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शोषण होता है उस एक वर्ग का दीनता और दुख नष्ट करने के लिए मार्क्स का कहना है कि निजी संपत्ति पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। व्यक्तिगत रूप से किसी की भी सम्पत्ति नहीं होनी चाहिए या संपत्ति इकट्ठा नहीं करनी चाहिए। कार्ल मार्क्स की तकनीकी भाषा में बताना हो तो कहा जा सकता है कि, कामगारों के या मजदूरों के परिश्रम से पैदा होने वाले अतिरिक्त धन सेखुद की तिजोरी भरने वाला निजी संपत्ति का मालिक बनता है। मजदूर अपने गाढ़े परिश्रम से उत्पादन बढ़ाता है और अतिरिक्त धन प्राप्त करा देता है, लेकिन इस अतिरिक्त धन पर उन कामगारों का कोई अधिकार नहीं होता। उन्हें उसमें से कोई हिस्सा नहीं मिलता। सारा अतिरिक्त धन मालिक ही हड़प लेता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कार्ल मार्क्स ने पूछा कि कामगारों द्वारा अपनी श्रमशक्ति के बल पर निर्माण किए अधिक उत्पादित धन पर मालिक क्यों हक़ जताए? मार्क्स के मतानुसार उस संपत्ति पर केवल राज्य का ही अधिकार होना चाहिए और यह राज्य कामगारों का होना चाहिए। इसी कल्पना के आधार पर मजदूर अथवा कामगार वर्ग की तानाशाही का सिद्धांत मार्क्स ने स्थापित किया। मार्क्स द्वारा जो सिद्धांत स्थापित किए गए हैं, उनमें से यह तीसरा सिद्धांत है। मार्क्स के अनुसार मजदूर वर्ग की तानाशाही का मतलब है कि, प्रशासन शोषणकर्ताओं का नहीं बल्कि जिनका शोषण होता है उन मजदूरों का होना चाहिए। कार्ल मार्क्स के मूलभूत सिद्धांत ऐसे ही हैं। रूस में इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित साम्यवाद का प्रशासन लागू किया गया है। इस सिद्धांत में बाद में और बातें भी जुड़ती रही हैं और अभी भी जोड़ी जाती रही हैं। हालांकि, बुनियादी सिद्धांत पहले जैसे बताए हैं वही हैं।
अब मैं पल भर के लिए बौद्ध दर्शन की ओर मुड़ता हूं। क्योंकि कार्ल मार्क्स द्वारा उपस्थित किए गए बुनियादी सिद्धांतों के बारे में बुद्ध का कुछ कहना है क्या यह देखना जरुरी है। मार्क्स ने गरीबी के बारे में अथवा मजदूरों के शोषण से संबंधित विषय उपस्थित करके अपने मार्क्सवाद या साम्यवाद का सिद्धांत बनाया है। बुद्ध क्या कहता है? उसने कहां से शुरुआत की है? बौद्ध दर्शन या बौद्ध धम्म की इमारत कौन-सी बुनियाद परखड़ी है? कार्ल मार्क्स की तरह बुद्ध ने भी 2500 वर्ष पूर्व यानी कार्ल मार्क्स से कई सालों पूर्व यही बात कही है। बुद्ध ने कहा - इस दुनिया में दुख है, बुद्ध द्वारा कार्ल मार्क्स जैसा शोषण शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। लेकिन शोषण के कारण जिस दुख, दीनता का निर्माण होता है उसी दुख के बारे में जानकारी देकर बुद्ध ने अपने दर्शन की, अपने धम्म की स्थापना की। दुनिया में दुख है यह पूरे विश्व द्वारा माना गया सच है यह कह कर बुद्ध ने दुख की अलग-अलग अर्थों में परिभाषा दी। बुद्ध ने दुख यानी पुनर्जन्म, दुख यानी जीवन-मृत्यु का चक्र भी कहा है। हालांकि, मैं इस अर्थ से सहमत नहीं हूं। दुख शब्द का इस्तेमाल दरिद्रता, गरीबी के अर्थ में भी किए जाने के उदाहरण बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। इसलिए बौद्ध दर्शन की बुनियाद और कार्ल मार्क्स के दर्शन की बुनियाद में कोई फर्क दिखाई नहीं देता। इसका मतलब यह है कि कार्ल मार्क्स द्वारा स्थापित किया गया