478 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सिद्धांत भी नया नहीं है। जब जीवन की मौलिक बुनियाद ढूंढने के लिए किसी भी बौद्ध बंधु को कार्ल मार्क्स का दरवाजा ठोंकने की जरूरत नहीं है। पहले प्रवचन के उपदेश में ही बुद्ध द्वारा यह बुनियाद पहले ही से बढि़या ढंग से स्थापित कर रखी गई है। उनका यह प्रवचन बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्रप्रवर्तन सुत्त’ के नाम से जाना जाता है। जिन लोगों के मन पर कार्ल मार्क्स के विचारों की पकड़ है, उनसे मैं बस यही कहना चाहता हूं कि, आप ‘धम्मचक्रप्रवर्तन’ सुत्त का अध्ययन कीजिए। बुद्ध ने क्या कहा है यह समझिए। मुझे यकीन है कि आपको उसमें मानवीय जीवन संग्राम के बारे में जवाब जरूर मिलेगा। बुद्ध ने अपने दर्शन या धम्म का निर्माण ईश्वर, आत्मा अथवा ऐसी ही न समझ में आने वाली मानवीय बातों पर नहीं की है। मानव के वास्तविक जीवन की ओर ही अंगुलिनिर्देश कर अपना पूरा दर्शन विषद किया है। मनुष्य यातना, दुख से परेशान होता है। मानवी जीवन की यह वास्तिकता है। केवल मार्क्स ने ही इन बातों का विवेचन किया हो ऐसी बात नहीं है। उसके जन्म से 2000 वर्ष पूर्व बुद्ध ने ये बातें जानीं और उन पर उपाय भी बताए। यह विशेष बात है। आपको यह सब जानना चाहिए। इसी प्रकार आप जान जाएंगे कि, गरीबी के बारे में बुद्ध के और कार्ल मार्क्स के दर्शन में कमाल की समानता है।
मार्क्स के विचारों के अनुसार मजदूरों के शोषण का विरोध करने के लिए उत्पादन से प्राप्त होने वाली संपत्ति राज्य को अपने कब्जे में लेनी चाहिए। राज्य को सभी जमीनों का मालिक होना चाहिए। सभी उद्योगों पर राज्य का ही अधिकार हो। इससे निजी मालिक हुकूमत कायम नहीं कर पाएंगे। इसी प्रकार मजदूरों की श्रमशक्ति से निर्मित उत्पादों पर मिलने वाले अतिरिक्त मुनाफे से मालिक को नहीं मिले, जिससे कि वह मजदूर को लूट न सके। मजदूरों के शोषण के संदर्भ में कार्ल मार्क्स के विचार इस प्रकार हैं।
आइए देखते हैं कि निजी मालिकाना हकों के संदर्भ में बुद्ध के क्या विचार हैं। इसके लिए हमें बौद्ध भिक्षु संघ के बारे में सोचना पड़ेगा और बुद्ध द्वारा भिक्षुओं के लिए लागू किए जीवन-नियमों के बारे में बारीकी से अध्ययन करना होगा। बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए क्या नियम बताए हैं? बुद्ध ने बताया है कि किसी भी बौद्ध भिक्षु को निजी संपत्ति नहीं बनानी या रखनी चाहिए। असल में सभी भिक्षुओं के पास अपनी सम्पत्ति न होने के बारे में कहा है इसके बावजूद आज आपको कुछ अपवादस्वरूप उदाहरण मिलेंगे। कुछ देशों के भिक्षु वर्गों में अपनी संपत्ति होने के उदाहरणखुद मैंने देखे हैं। लेकिन बहुसंख्यक भिक्षुओं के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं है। संपत्ति रखने के मामले में बौद्ध धम्म के नियम जितने कठोर हैं उतने कठोर रूस के साम्यवादियों द्वारा बनाए गए नियम भी नहीं होंगे। यह विषय आज तक किसी ने विचारार्थ नहीं लिया है और अगर कभी लिया भी है तो किसी निर्णय तक नहीं पहुंचा विषय है इसीलिए मैंने आज यही विषय चुना है ।
भिक्षु संघ बनाने के पीछे बुद्ध का क्या उद्देश्य रहा होगा? भिक्षुओं का संघ हो ऐसा