347 20-11-1956 बुद्ध या कार्ल मार्क्स - काठमांडू - Page 498

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उसे क्यों लगा होगा? इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि बुद्ध जब अपने धम्म का प्रचार-प्रसार कर रहा था तब जैन साधु कहे जाने वाले लोग यहां-वहां घूमा करते थे। वे बुद्ध के पहले से ही यहां-वहां घूमते रहे थे। जैन साधु शब्द का अर्थ निराश्रित होता है। यानी जिनके पास घर-बार नहीं है ऐसे लोग। आर्ययुग में आर्यों की अलग-अलग टोलियां अन्य जंगली टोलियों की तरह आपस में लड़ रही थीं। जीतने वाली टोली स्थायी रूप से बस जाती। हारने वालों में से कुछ टोलियां अपना घर-बार, संपत्ति छोड़ कर केवल घुमक्कड़ी करती रहतीं। स्थायी जीवन उन्होंने कभी नहीं स्वीकारा। ऐसे ही घुमंतु लोगों को बाद में जैन साधु कहा गया। बुद्ध ने इस प्रकार घूमते रहने वाले जैन साधु लोगों को इकठ्ठा कर उनका संघ बनाने का तथा उनके घुमन्तु जीवन को स्थिर बनाने का बड़ा काम किया। जिन नियमों के आधार से ऐसे जैन साधु को बौद्ध बनाया गया उन सभी नियमों का जिक्र हमें ‘विनयपिटक’ में मिलता है। जैन साधु बौद्ध भिक्षु बने और विनयपिटक में बताए गए नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए जीवन यापन करने लगे। उन नियमों के अनुसार भिक्षुओं को संपत्ति या वस्तु रखने की इजाजत नहीं थी। भिक्षुओं को केवल आगे गिनाई गई सात वस्तुएं रखने की ही इजाजत थी - एक उस्तरा, एक लोटा, एक भिक्षापात्र, तीन चीवर, और एक सुई। साम्यवाद के मूल आशय के अनुसार निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए यह नियम अगर था तो विनयपिटक में बौद्ध भिक्षुओं के लिए बताए गए इतने कठोर नियमों जैसे नियम क्या और कहीं होंगे? मेरी नजर में तो ऐसे कठोर नियम अन्यत्र कहीं नहीं आए। इसीलिए निजी सम्पत्ति न रखने के मामले में साम्यवादी मतप्रण् ाली का आज के युवक को आकर्षण लगता हो तो उसे निश्चित तौर पर बौद्ध दर्शन का विनयपिटक पढ़ना चाहिए। उसे जिस चीज कीखोज होगी वह उसमें उसे निश्चित तौर पर मिलेगी। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि निजी संपत्ति न रखने का नियम पूरे समाज पर कैसे लागू किया जा सकता है? स्पष्ट है कि ये सारी बातें समय, स्थितियां और मानवीय जीवन के विकास पर निर्भर करती हैं। सैद्धांतिक तौर पर विचार करें तो क्या निजी संपत्ति ले लेना गलत है? हो सकता है किसी को निजी संपत्ति रखने की इच्छा हो तो क्या बौद्ध धर्म आड़े आएगा? निश्चित तौर पर नहीं। क्योंकि बौद्ध भिक्षु संघ बनाते समय बुद्ध ने कुछ रियायतें दी हैं। जरूरतें पूरी करने वाली संपत्ति रखने के लिए बुद्ध ने मना नहीं किया है। इस बात परखास तौर से ध्यान देना जरुरी है।

अब इसी बात के दूसरे मुद्दों की ओर हम मुड़ते हैं। साम्यवाद लाने के लिए कार्ल मार्क्स या साम्यवादी लोग किस मार्ग का अनुसरण करने के लिए कहते हैं? यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। साम्यवाद (यानी दुख के अस्तित्व को मानते हुए निजी संपत्ति को नष्ट करने का तत्व) को स्थापित करने के लिए साम्यवादियों का बताया मार्ग धर्म के आचरण के विरुद्ध है। विरोधकों की हत्या करने का मार्ग है। और इसी में बुद्ध और कार्ल मार्क्स के उपायों में मौलिक फर्क नजर आता है। बौद्ध दर्शन या बौद्ध धम्म स्थापित करने के