480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए लोगों को मनाने का मार्ग ही सही होने की बात बुद्ध ने कही है। नैतिक शिक्षा और प्रेम से लोगों के मन जीतने पर बुद्ध जोर देते हैं। विरोधियों को जोर-जबरदस्ती से या सत्ता के सहारे वह नहीं जीतना चाहते बल्कि प्रेम और अपनेपन से जीतना चाहते हैं।
इस बुनियादी फर्क को अगर जान लें तो पता चलेगा कि दर्शन को प्रस्थापित करने के लिए बुद्ध को हिंसा याखूनखराबा स्वीकार नहीं। साम्यवादियों को लेकिन बलात मार्ग ही पसंद है। इस मार्ग से साम्यवादियों को तुरंत फलप्राप्ति होती है या, उनके उद्देश्यों को पाने में उन्हें तुरंत सफलता मिलती है, इसमें कोई दो राय नहीं। क्योंकि आप जब इंसान को निर्मूल करने के दर्शन के सहारे ही आगे बढ़ते हो तब तुम्हारा विरोध या प्रतिकार करने के लिए कोई बचता ही नहीं अर्थात्, ऐसी सफलता केवल दिखावे की होती है। मार्क्सवाद की तुलना में बौद्ध धर्म का मार्ग मंदगति वाला और लंबी दूरी वाला है। लोगों को यह ऊबाऊ लगने की भी संभावना है। क्योंकि इस मार्ग से सफलता बड़ी देरी से प्राप्त होती है। लेकिन यह बात भी सच है कि मार्ग सुरक्षित है। आपकी जिंदगी का भरोसा है। इसीलिए आदर्शों के मार्ग पर चलते हुए बुद्ध के बताए सुरक्षित मार्ग पर आगे बढ़ना ही हितकारी होगा।
अपने साम्यवादी मित्रों से मैं हमेशा दो-तीन सवालों के जवाब मांगता रहता हूं। लेकिन मैं ईमानदारी से बताता हूं कि मेरे सवालों के जवाब उनके पास नहीं हैं। मजदूर वर्ग की तानाशाही वे हमेशा रक्तपात से स्थापित करना चाहते हैं। राजनीतिक सत्ता का वर्चस्व वाले पक्ष को वे नेस्तनाबूत करना चाहते हैं। उनके मतानुसार लोकसभा में प्रतिनिधित्व हो नहीं सकता। मताधिकार नहीं हो सकता। वे राज्य की एकतंत्री महाप्रज्ञा बन कर रहना चाहते हैं। सत्ता या अधिकारों का बंटवारा किए बगैर राज्य करना है। इसलिए मैं उनसे यह सवाल करता हूं कि क्या तानाशाही लोगों पर शासन करने का सही तरीका है? इस पर उनका जवाब होता है कि उन्हें तानाशाही कभी भी स्वीकार नहीं थी। मैं उनसे फिर पूछता हूं कि वे मजदूरों की तानाशाही क्यों सहें? इस पर उनका जवाब होता है कि, चूंकि यह निर्णायक दौर है इसलिए मजदूरों की तानाशाही का निर्माण होना आवश्यक है।
मजदूर वर्ग की तानाशाही बने हुए बगैर स्थापित पूंजीपतियों की तथा अतिरिक्त धन हड़पने वाले मालिकों काखात्मा नहीं होगा। उनसे जब पूछा जाता है कि यह निर्णायक समय- बीस, चालीस या पचास सालों तक? कब तक चलेगा? इसका उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं है। वे यूंही ढुलमुल-सा जवाब देते हैं कि साम्यवाद के स्थिर होने के बाद मजदूरवर्ग की तानाशाही अपने आपखत्म हो जाएगी। ठीक है, मान लेते हैं कि वह अपने आप समाप्त हो गई। तो फिर आगे क्या? उसकी जगह कौन लेगा? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं है।
इस संदर्भ में हम जब बुद्ध की तरफ मुड़ते हैं और उसके धम्म संबंधी प्रश्न उठाते हैं तब वह क्या कहता है? बुद्ध ने दुनिया को एक बहुत महान बात बताई। बुद्ध की