347 20-11-1956 बुद्ध या कार्ल मार्क्स - काठमांडू - Page 501

482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अध्यक्ष महोदय अगर इजाजत दें तो मैं आपका ध्यान इसी बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि मैं राजनीति शास्त्र का छात्र था, मैं अर्थशास्त्र का भी छात्र था, इतना ही नहीं तो मैं अर्थशास्त्र का अध्यापक भी रहा। मेरे जीवन का बड़ा हिस्सा कार्ल मार्क्स, साम्यवाद और अन्य कई विषयों का अध्ययन करने में बीता है। साथ ही, बुद्ध के धम्म के बारे में जानने में भी मैंने अपने जीवन का बहुत सारा समय व्यतीत किया है। बौद्ध दर्शन और और मार्क्सवाद का जब मैंने तुलनात्मक अध्ययन किया तब मैं इसी निष्कर्ष तक पहुंचा कि दुनिया की एक बहुत बड़ी समस्या के बारे में - यानी दुनिया में दुख है और उसके निवारणार्थ एक निश्चित उपाय है इस बारे में - बुद्ध का मार्ग ही सर्वोत्तम मार्ग है। सुरक्षित और मजबूत भी है। इसी कारण मैं बौद्ध राष्ट्रों के युवाओं को बताना चाहता हूं कि वे बुद् धके ही यथार्थवादी दर्शन पर ज्यादा ध्यान दें। उसी का अनुसरण करें।

अगर कभी बौद्ध धम्म पर संकट का समय आए तो बौद्ध राष्ट्र के भिक्षुओं को ही जिम्मेदार ठहराना होगा क्योंकि मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि जिन भिक्षुओं को तन-मन-धन से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए उन्होंने उसे नहीं किया, यही इसका मतलब निकलता है। आज कहां धर्मप्रसार हो रहा है? बौद्ध धम्म प्रचार की आज क्या स्थिति है? भिक्षु का असली कर्तव्य धम्मप्रसार करना होता है। तो आज भिक्षु क्या कर रहे हैं? आज का भिक्षुखा-पी कर विहार में बैठा रहता है। वह केवल एक ही बार भोजन लेता है इस बारे में कोई शक नहीं। लेकिन उसका ज्यादातर समय केवल आलस में ही बीतता है। वह थोड़ा बहुत पढ़ता है, लेकिन वह ज्यादातर सोता ही रहता है। शाम के समय संगीत से अपना मन रिझाता है। लेकिन यह कोई धम्मप्रसार का मार्ग नहीं है। मित्रों, किसी की आलोचना करने का मेरा उद्देश्य नहीं है। लेकिन अगर धम्म में समाज में नवजागृति लाने का नैतिक बल हो तो आपको धम्म की सोच हमेशा लोगों के कानों से टकराती रहनी चाहिए। बच्चे को स्कूल में कितने साल बिताने पड़ते हैं? आप केवल एक दिन के लिए बच्चे को स्कूल नहीं भेजते। उसके बाद उसे घर में बिठा कर उस बच्चे को सारा ज्ञान ग्रहण करना चाहिए, सारा ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए ऐसी उम्मीद आप उससे नहीं रखते। बच्चा हर रोज स्कूल गया, वहां पांच घंटे उसने बिताए, उसने लगातार पढ़ाई की तो ही वह थोड़ा बहुत ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जो के भिक्षु एक भी दिन लोगों को विहार में नहीं बुलाते और न ही किसी विषय पर शिक्षा देते या धर्मोपदेश देते हैं। कम से कम मेरे देखने में ऐसी कोई बात नहीं।

एक बार मैं सिलोन गया था। मैंने वहां के लोगों को बताया कि मैं देखना चाहता हूं कि भिक्षु कैसे धम्मप्रसार करते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उनके यहां दान की पद्धति है। बाद में मुझे पता चला कि वणाक् के अर्थ में दान का प्रयोग किया जाता है। वे मुझे 11 बजे के आसपास एक जगह ले गए। वहां टेबिल के आकार की एक चारपाई थी। मैं जमीन पर बैठा। थोड़े समय बाद एक भिक्षु आए। कई उपस्थित महिला और पुरुषों