484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कमेटी द्वारा बनाया गया ढांचा कई लोगों की निजी जमीन से होकर जा रहा था। मैंने उनसे पूछा कि ऐसे हाल में समिति रास्ता कैसे बना सकेगी? जिनकी निजी जमीनों से सड़क जाएगी उन्हें नुकसान भरपाई के तौर पर देने के लिए क्या समिति के पास उतना पैसा है? तब उन्होंने मुझे बताया कि पैसों की मांग अब तक किसी ने नहीं की है। उल्टे, रास्ता बनाने के लिए जगह की जरूरत हो तोखुशी से ली जाए यही उनका कहना है। सुन कर मैं आश्चर्यचकित हुआ। क्योंकि मेरे देश में बिना क्षतिपूर्ति के किसी की अगर थोड़ी-सी भी जमीन ली जाए तोखूनखराबा होता है। लेकिन ब्रह्मदेश में ऐसा नहीं होता, क्यों? ब्रह्मी लोग अपनी संपत्ति को लेकर इतने उदार कैसे हैं? क्या उन्हें अपनी जमीन से क्या लोभ नहीं है? क्या उन्हें अपनी संपत्ति को लेकर चिंता नहीं है? इसकी वजह यही है कि बुद्ध के सब अनित्यम् का उपदेश उनके मन में अच्छी तरह से बसा हुआ है। दुनिया की कोई भी वस्तु नित्य नहीं, शाश्वत नहीं, वह नश्वर है तो फिर ऐसी अनित्य वस्तु के लिए झगड़े क्यों? जमीन अगर चाहिए तो बेशक लीजिए, ऐसा ही वे सोचते हैं।
भाइयों और बहनों, इसके अलावा और कुछ बताऊं ऐसा कुछ बचा नहीं है। आपको कुछ मुद्दों के बारे में पता करवाऊं इतना ही मेरा उद्देश्य था। साम्यवाद की विजयदुंदुभी से आप डर मत जाइए और न ही उनसे अभिभूत होइए। आप अगर बौद्ध सोच का और दर्शन का एक दशमांश भाग भी आत्मसात कर सकें तो साम्यवाद जो निर्माण करना चाहता है वह आप करुणा, न्याय और सद्भावना के बल पर कर पाएंगे इसमें कोई शक नहीं। धन्यवाद!’’ ख्2,
‘‘बाबासाहेब के ये विचार परिषद के कई प्रतिनिधियों को बौद्ध धर्म का एक अभिनव दर्शन जैसा ही लगा। बुद्ध के चार आर्यसत्यों में से एक सत्य, दुख की मार्क्स के आर्थिक शोषण से जो समानता दिखाई गई और बौद्ध धर्म को जो एक प्रेरक जीवंत सामाजिक शक्ति के रूप में जो उन्होंने प्रस्तुत किया वह एक नया दृष्टिकोण है। बुद्धवचनों का उसे आधार भी है। कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने बाबासाहेब से मिल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ऐसा कहा।’’ ख्3,
बुद्ध, मार्क्स और धम्म का भविस्थः रत्नमित्रा गणवीर, पृ. 29-44
प्रबुद्ध भारतः 3 अगस्त, 1957