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‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ यह एक बौद्धिक चालाकी है
‘‘23 नवंबर, 1956 को रात 9 बजे आसनसोल पैसेंजर से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर आने वाले थे इसलिए आसनसोल स्टेशन पर उनका स्वागत करने के लिए शहर के सम्मानीय व्यक्ति, काशी विश्वविद्यालय और हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र, महाबोधि सभा के कार्यकर्ता तथा दलित वर्ग के बहुत सारे लोग बड़े पैमाने पर वहां उपस्थित थे। स्टेशन पर आए लोगों में आयु. प्रभु नारायण सिंह, एमएससी, भिक्षु धर्मरक्षित, भिक्षु संघरत्न, मेला अधिकारी आयु. जगदीश शरण सिंह, आयु. जगन्नाथ उपाध्याय आदि उपस्थित थे।
स्टेशन पर बैंड बज रहा था और घोषणाएं की जा रही थीं। लोग बौद्ध पताका लेकर गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। गाड़ी के आते ही डॉ. बाबासाहेब की जय, अम्बेडकर जिंदाबाद के नारे लगाते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का स्वागत किया गया। भीड़ के बेकाबू होने के कारण कुछ लोग दब गए।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर स्टेशन से ‘होटेल दी पेरिस’ में गए औरखानाखाने के बाद वे सारनाथ के लिए रवाना हुए। वह वहां के नवनिर्मित अतिथिगृह में 23 नवंबर, 1956 से 27 नवंबर 1956 की दोपहर तक रुकने वाले थे। इसी दौरान उन्होंने वहाँ भाषण दिए।
दिनांक 24 नवंबर. 1956 के दिन 3 बजे काशी हिंदू विश्वविद्यालय संघ द्वारा आर्टस् कॉलेज के मैदान में आयोजित सभा को उन्होंने संबोधित किया। ख्1,
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,
मुझे किस विषय पर बोलना है यह मुझे बताया नहीं गया है। इसलिए आपके हिंदू विश्वविद्यालय के परिसर में प्रवेश करते वक्त जो विचार मेरे दिमाग में रहे हैं वही मैं आपके सामने व्यक्त करने जा रहा हूं। हिंदू समाज रचना का एक अध्ययनकर्ता इस नाते हिंदू जीवन-विषयक दर्शन का अध्ययन करते हुए मुझे विभिन्न विचार-पद्धतियां दिखाई दीं। बुद्धकाल में 92 दर्शन प्रचलित थे। उनमें से छह अध्ययन योग्य माने जाते थे। वर्तमान युग का आम हिंदू समाज ज्यादातर शंकराचार्य के दर्शन को प्रमाण मानता है। शंकराचार्य का प्रमुख सिद्धांत है ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या!’ यानी कि ब्रह्म ही सत्य है और
- धर्मदूतः महाबोधि सभा, सारनाथ का मासिक मुखपत्र, संपादक - त्रिपिटिकाचार्य भिक्षु धर्मरक्षित, दिसंबर,
1956, पृ. 244, 257-258