348 24-या11-1956 ब्रह्म सत्यांजगन्मिथ्या, यह एक बौद्धिक षडयंत्र है - आसनसोल - Page 505

486 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दुनिया मायामयी है। इन विचारों की पकड़ हिंदू मन पर पक्की है। आपने इससे पहले इस बात पर सोचा है अथवा नहीं यह मैं नहीं जानता। मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि यह सिद्धांत कहां तक मनुष्य के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होता है? शंकराचार्य कहते हैं, ब्रह्म सत्य है। लेकिन इस सत्य की व्याख्या क्या है? व्यावहारिक जीवन में मनुष्य के पंचेंद्रिय ही उसे सत्य-असत्य की पहचान बता देते हैं। ज्ञानेंद्रिय ही उसके ज्ञानार्जन के अंतिम साधन हैं।

फूलों की सुगंध का नाक से यानी घ्राणेंद्रिय से पता चलता है। रंग, आकार आदि का दृष्दिं्रियों से पता चलता है। स्वाद का पता जिव्हा से चलता है। लेकिन शंकर का ब्रह्म ‘नेति नेति’ शब्द से ही वर्णित किया जाता है। शंकर के ब्रह्म की व्याख्या नकारात्मक है। इसके विपरीत महायान की ब्रह्म विहार की कल्पना चिंतनीय है। उनके ब्रह्मविहार में दान, उपरेखा (त्याग), करुणा और मैत्री इन चार गुणों का परमोत्कर्ष सम्मिलित है। जहां-जहां ये चार गुण वास करते हैं उन-उन जगहों पर उनकी नजर में ब्रह्म है। शंकर अपने ब्रह्म के ठौर-ठिकाने के बारे में पता नहीं लगने देता।

किसी विधान में ( proposition ) वास्तविक सत्य नहीं होता केवल काल्पनिक सत्य होता है तब भी व्यवहार में उसका उपयोग हो सकता है। कानून में हम सामाजिक हित के लिए कानूनन काल्पनिक सत्य (legal fiction) को मानते हैं। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के पास जमीन का टुकड़ा है लेकिन वह उसने किससेखरीदा, या विरासत के अधिकार में पाया इस बारे में उसके पास कोई कागजात या अन्य सबूत नहीं हैं तो ऐसे समय में कोर्ट एक सिद्धांत बनाता है कि उसे वह जमीन राजा के द्वारा तोहफे में मिली होगी। इस प्रकार के काल्पनिक सत्य को मान कर चलने में कुछ भी गलत नहीं है। शंकर बताता है कि ब्रह्म सर्वत्र है। इस सार्वत्रिक ब्रह्म को काल्पनिक सत्य मानने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन फिर यह मुश्किल पैदा होती है कि ब्रह्म अगर हर जगह है तो सब समान माना जाना चाहिए। ब्राह्मणों में अगर ब्रह्म है तो फिर उसे अस्पृश्यों में भी होना चाहिए। तो फिर ब्राह्मण श्रेष्ठ और अस्पृश्य शूद्र इस प्रकार भेद क्यों किया जाता है?

अगर शंकर ब्रह्म की सार्वत्रिकता के आधार से अखिल मानवजाति एक होने की बात कह सकता है और समता मानता है तो उसके उस सिद्धांत को विचारार्ह और गंभीर माना जाता। फिर तो शंकर से बहस करने का भी कोई कारण नहीं बचता। मेरा शंकर पर यही आरोप है कि वह ‘ब्रह्म सत्यं’ की बात केवल बौद्धिक स्तर तक ही सीमित रखता है। उसे सामाजिक स्तर पर लाने से वह हिचकता है।

‘जगन्मिथ्या’ यानी दुनिया नजर का छलावा है। यह सिद्धांत तो व्यावहारिक स्तर पर कितना साधार है? हमारे ज्ञानेंद्रिय हमें दुनिया की वास्तविकता का अहसास करा रहे हैं। ऐसे में हम दुनिया का अस्तित्व कैसे नकार सकते हैं? अगर दुनिया का ही कोई