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अस्तित्व नहीं तो फिर आपका और मेरा अस्तित्व कैसे हो सकता है? और फिर मेरे अहसासों के (consciousness) क्या मायने बचेंगे? एक कहानी बताई जाती है कि, एक दिन एक पगलाया हाथी शंकर पर हमला करता है और शंकर अपना ‘दुनिया मिथ्या है’ वाला सिद्धांत भूल कर भागने लगता है। उसे भागते हुए देख कर आसपास के लोग उससे बोले, ‘अरे भाग क्यों रहे हैं? हाथी मिथ्या है।’ शंकर ने भागते-भागते जवाब दिया, ‘मेरा भागना भी मिथ्या है।’ इस जवाब में शंकर की हाजिरजवाबी दिखाई देती होगी लेकिन उससे किसी बुद्धिवादी की संतुष्टि नहीं होती। कुल मिला कर ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या!’ यह एक बौद्धिक झमेला, षड्यंत्र या तिकड़मबाजी ही है। जिस सिद्धांत का सैद्धांतिक परिणाम चतुरवर्ण को गाड़ने में होता उस सिद्धांत को शंकर ने बौद्धिक स्तर तक सच मान कर सामाजिक जीवन में उसके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया। विचार और आचार का यह फेर और बेईमानी शंकर से लेकर गांधी तक दिखाई देती है। गांधी से एक बार मैंने सवाल पूछा था कि आपके चतुरवर्ण हाथ केखड़े पंजे की उंगलियों की तरह एक के ऊपर एक हैं या कि लेटी हथेली की उंगलियों की तरह एक ही स्तर पर है? मेरे सवाल का जवाब उन्होंने नहीं दिया। लेकिन निःसंशय उनकी श्रद्धा क्रमिक विषमता (graded inequality) पर आधारित थी। उनके ‘वर्णव्यवस्था’ और ‘गांधी शिक्षण’ ग्रंथ इसके साक्ष्यस्वरूप हैं।
हिंदू लोग वेदों को मानते हैं और पुरुषसूक्त का तो वे नित्य पठन करते हैं। इस सूक्त में अगर इतना ही बताया जाता कि समाज की रचना कैसी होती है तो वह अधिक आपत्तिजनक नहीं होता। समाज में चार अलग-अलग व्यवसाय करने वाले लोग होते हैं यह वाक्य केवल ऐतिहासिक सत्य साबित हो सकता है। लेकिन इन चार तरह के व्यवसाय वाले लोगों को श्रेष्ठ-कनिष्ठता, उच्च-नीचता केवल धार्मिक नजरिए के आधार से चिपका देना विशुद्ध क्रूरता है। इसीलिए विषमता को और उच्च-नीचता को धार्मिक अधिष्ठान दिलाने वाले हिंदू समाज रचना का आद्य सिद्धांत पुरुषसूक्त सभी प्रकार से निषेध योग्य है। इस पुरषसूक्त को तथा उसका प्रतिपादन करने वाले हिंदू धर्मग्रंथों को आप मानेंगे या कि स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और न्याय इन चार उदात्त तत्वों पर आधारित राज्य के संविधान को आप मानेंगे? विद्यार्जन को आप केवल अपना पेट पालने का एक साधन न मान कर प्राप्त की गई विद्या से अपने मन को सुसंस्कारित करने की कोशिश अगर आप करते हों तो या तो आपको संविधान के खिलाफ विद्रोह करना होगा या फिर विषमता प्रधान वैदिक और ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों को तिलांजली देनी होगी। और उसे हमेशा के लिए कुड़ेदान में डालना होगा।
भारत का हर नागरिक संविधान के साथ निष्ठा रखने के लिए बंधा है। आप अगर ईमानदार हैं तो आपको अपनी निष्ठा के खिलाफ जाने वाली हिंदू संस्कृति का विरोध