349 24-11-1956 हर रविवार के दिन बुद्धविहार में जाना हर बौद्ध धर्मीय का आद्य कर्तव्य है - सारनाथ - Page 510

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हम पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठाई इसके पीछे जो वजह थी यह थी कि उन्हें लगता था कि यह हिंदुओं का घरेलू झगड़ा है। अगर बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद भी हिंदू लोग हमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि से दूर रखेंगे तो हम ऊपरी बौद्ध राष्ट्रों के सहयोग से उसे पाए बगैर नहीं रहेंगे।

हिंदू धर्म के माथे पर अस्पृश्यता का कलंक लगा हुआ है। इसी के कारण हिंदू जाति के हृदय की दुष्ता दिखाई देती है। अस्पृश्य जाति पवित्र और शुद्ध होने के बाद भी अगर भगवान के दर्शन करने जाते हैं तब भी उनके लिए मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं। छुआछूत भेदभाव, जातिपांति आदि का जड़ से विनाश करना सवर्ण हिंदुओं का कर्तव्य है। हम अपने कंधों पर उनकी लाश क्यों ढोएं?

आज मैं अस्पृश्यों को आवाहन करता हूं कि वे ऐसे ही धर्म को स्वीकार करें कि जिस धर्म में मनुष्यमात्र के लिए भेदभाव न हो। समता है और मित्रता के नाते वे एक साथ हो सकते हैं। यही ऊंचा आदर्श बौदध धर्म में है। जिस प्रकार कई नदियां समंदर में आकर मिलती हैं और अपना अस्तित्व भूल जाती हैं उसी प्रकार बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद ही सभी लोग समान होते हैं। उनमें किसी प्रकार की विषमता नहीं रहती। बौद्ध धम्म अस्पृश्यों के लिए ही नहीं तो सभी मानवों के लिए भी कल्याणकारी है। सवर्ण हिंदू इस धर्म को अवश्य स्वीकार करें।

अन्य धर्मों में सृष्टि का निर्माता ईश्वर समझा जाता है और जो दोष बाकी हैं उसके लिए ईश्वर को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसी विचारधारा बौद्ध धर्म में नहीं है। बौद्ध धर्म में कहा गया है कि दुनिया में दुख है। उस दुख को नष्ट किया जा सकता है यह मानकर सोचा गया है कि इस दुख को दूर करने के मार्ग क्या हैं। हिंदू धर्म की विचारधारा रूढि़यों पर आधारित है। ये रूढियां चतुरवर्ण पद्धति से पैदा हुईं। बौद्ध धर्म में कई भिक्षु और भिक्षुणियां हुए हैं। उनके बारे में जानकारी थेर गाथा और थेरी गाथा में मिलती है।

हिंदुओं को न्याय करने का अधिकार था, लेकिन आज तक उन्होंने अस्पृश्यों के साथ केवल अन्याय ही किया है। हिंदुओं से हमें अलग होकर भगवान बुद्ध के चरणों में विनम्र होना होगा।

मुझे काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में जाने नहीं दिया गया ऐसी झूठीखबर अखबारों में प्रकाशित होने की बात मैंने सुनी। मैं किसी भी हिंदू मंदिर में नहीं जाता। मेरी सौ बार प्रार्थना की जाए तब भी मेरा उस मंदिर में जाना संभव नहीं था। मेरे निजी सचिव को नेपाल के महाराजा ने पहले दिन बुला कर सूचना की थी कि डॉक्टरसाहब को मंदिर में जाने न दें। उन्होंने कहा था कि बौद्धों को हिंदू मंदिरों में जाने देने जितने आज के हालात