492 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं हैं। नेपाल, लंका और भारत के भिक्षु मंदिर में जा रहे थे उन्हें मनाही की गई। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करना उसका ऐसा करना यानीखुद के मन को धोखा देना था। हिंदुओं के ईश्वर का अपमान करना है। बौद्ध कभी भी हिंदुओं के मंदिर में न जाएं। बौद्ध विहारों में सभी समान हैं। वहां किसी का भी निषेध नहीं किया जाना चाहिए।
जो अस्पृश्य हिंदू धर्म में रहते हुए मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं यह उनका केवल दुराग्रह है। वे अगर अन्याय, अपमान और अशुद्धता सहनी हो तो फिर उनकी मर्जी है। लेकिन मुझे लगता है कि बौद्ध इस झमेले में पड़ने से बचें। हमारी हर रोज की प्रार्थना में हम कहते हैं ‘नत्थी मे सरणं अ××ाँ, बुद्धों में सरणं वरं’ - मैं बुद्ध के अलावा अन्य किसी की शरण नहीं जाऊंगा कहने वाले हिंदुओं के मंदिर में जाने का हठ क्यों करें?
काशी का मंदिर प्रवेश राजनीतिक स्टंट है। उससे दलितों का किसी भी तरह का फायदा नहीं होने वाला। इसीलिए बौद्ध धर्म को स्वीकार करके ही बंधुत्व का और समता का दर्जा प्राप्त करना इतना ही हमारा मुख्य कर्तव्य है। ख्2,
भाषण के बाद विभिन्न देशों से आए करीब 150 भिक्खुओं ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण का समर्थन कर सभी तरह से मदद देने का आश्वासन दिया।
शाम 5 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने सारनाथ के भग्न अवशेषों का निरीक्षण किया। धम्म के स्तुप के पास करीब-करीब एक घंटा रुक कर तिब्बती लामा की पूजा का अवलोकन किया। उसके बाद उन्होंने कुछ जानकारियाँ दीं जिनका सभी ने स्वागत किया।
रात 7 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने मूलगंध कुटी में विधिवत् लंबे समय तक बुद्ध पूजा की। उसके बाद उन्होंने भिक्षुओं के सूत्रपाठ सुने। साथ ही उन्होंने आधे घंटे तक तिब्बती उपदेश विधि का अवलोकन किया। ख्3,
प्रबुद्ध भारत, 23 फरवरी, 1957
धर्मदूत मासिक, सारनाथ, दिसंबर, 1956 पृ. 244