350 25-11-1956 बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा है यह कहना एक शरारत और छल-कपट है - काशी - Page 513

494 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आर्य और नाग, ब्राह्मण और क्षत्रिय, इनमें संघर्ष जब जारी था तब ब्राह्मणों ने ऋग्वेद में पुरुषसूक्त का अंतर्भाव किया होगा। पुरुषसूक्त से पूर्व चतुरवर्ण के चारों वर्ण समान स्तर पर थे। पुरुष सूक्त उच्च-निम्नता का तत्व समाज में ले आया। इसी समय भगवान बुद्ध ने भारतीय जीवन में प्रवेश किया। जिस शाक्य कुल में गौतम का जन्म हुआ उन शाक्यों का गणराज्य प्रजातंत्र प्रधान था। प्रजातंत्र की इस परंपरा में बढ़े गौतम को चतुरवर्ण व्यवस्था मान्य नहीं थी। आज बौद्ध धर्म कई सिद्धांतों का महासागर बना है। लेकिन बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत अथवा बुद्धमत समता पर ही आधारित है। बौद्ध धर्म का स्वीकार करने वाले लोग ज्यादातर नागवंशी और चतुरवर्ण में हीन माने जाने वाले वर्णों में से थे। नागों को युद्ध करना प्रिय था इसके बारे में मुचलिंद नाग की कहानी से पता चलता है। मुचलिंद की अग्निहोत्री काश्यपों से दुश्मनी थी। लेकिन काश्यपों के पास आतिथ्य के लिए आए बुद्ध का वह सेवक बना। बौद्ध धर्म की अभिवृद्धि का कारण शूद्रादिशूद्रों द्वारा बहुसंख्या से उसका किया स्वीकार ही है। बौद्ध साहित्य,खासकर थेर और थेरीगाथा के आधार से यह साबित किया जा सकता है।

बौद्ध धर्म हिंदू धर्म की ही एक शाखा है इस मत का प्रसार आजकल काफी बढ़ा है। वस्तुतः बुद्धप्रणीत धर्म समकालीन था। वह वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म से बहुत अलग था। वैदिक वेदग्रंथों को प्रमाण मानते थे और बुद्ध वेदग्रंथों का विरोध करते थे। कलामसूक्तों में बुद्ध ने प्रतिपादन किया है कि मनुष्य को सोचने की आजादी होनी चाहिए और वेदों ने मनुष्यों के लिए हमेशा के लिए टिकाऊ सोच नहीं दी है। बुद्ध द्वारा वेदप्रामाण्य पर किए गए आघातों का आगे के समय में हिंदुओं के भगवतगीता जैसे ग्रंथ पर भी असर हुआ है। गीता में एक जगह वेदपाठकों की आलोचना करते हुए उन्हें मेंढक कहा है। बुद्ध ने वेदों को मरुस्थल कहा है। वेदों में इंद्रादि देवताओं को उम्दे घोड़े, तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र, शत्रू पर विजय आदि ऐहिक सुखों के लिए की गई प्रार्थनाएं ही मुख्यरूप से हैं। उसमें उदात्त नीतितत्वों की सीख नहीं है। इसीलिए बुद्ध ने उसका धिक्कार किया।

यज्ञसंस्थाओं पर बुद्ध द्वारा किया गया आघात उनका समकालीन धर्म पर दूसरा आघात था। याज्ञिकों से उनका सवाल हुआ करता था कि गाय-बैलों को बलि चढ़ा कर आपको कौन-सा उच्च श्रेय मिलने वाला है? यज्ञसंस्था पर बुद्ध द्वारा की गई आलोचना के कारण हिंदुओं को इंद्र-वरुणादि आदि देवताओं का त्याग करना पड़ा। थोडा विषय से हट कर मैं आपसे पूछता हूं, हिंदू धर्म में जो ईश्वर की कल्पना है क्या वह सच है? काशी के आपके पूजनीय महादेव को अगर भगवान मानें तो भी उसका ब्याह भी होता है और वह अपनी ब्याहता के साथ नाचता भी है। ब्रह्मा-विष्णू का भी वही हाल है। इन्हें कैसे भगवान कहा जा सकता है? आज सामान्य मनुष्य को भी शरम आए ऐसे बुरे कृत्य उनके हाथों हुए हैं ऐसा आपके पुराण ही बताते हैं। ऐसा एक तो भगवान बताइए