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जिसका निष्कलंक चरित्र आज के आदमी को आदर्श और अनुकरणीय लगे। हिंदुओं के भगवान यानी राजाओं के कुल देवता। उनके पराक्रम यानी राजा का पौरोहित्य पाने के लिए ब्राह्मणों द्वारा रची गई उनके भगवानों कीखुशामद के पुराण। इंद्र, कृष्ण कैसे भगवान हैं? ऋग्वेद के आखिरी हिस्से में इंद्र की पत्नी द्वारा इंद्र को दी गई गालियां गिन कर देखिए! दुर्योधन संपूर्ण वज्रदेही ना बने और गदायुद्ध में भीम की ही विजय हो इसलिए कृष्ण का रचा कपट नाट्य देखिए! आपका पड़ोसी अगर इस तरह का बर्ताव करने लगे तो आप उसे क्या कहेंगे?खैर। बुद्ध ने पशुहत्या की निंदा की और यज्ञों की विफलता लोगों को समझा दी। इसीलिए ब्राह्मणों को अपने प्राचीन याज्ञिक आचार छोड़ने पड़े।
आश्रम व्यवस्था के बारे में भी बुद्ध का मत प्रचलित वैदिक धर्म से अलग था। ब्राह्मणों के मतानुसार ब्रह्मचर्याश्रम के बाद गृहस्थाश्रम स्वीकारना आवश्यक था। बुद्ध के मतानुसार ब्रह्मचर्य के बाद पारिव्रज्य स्वीकारा जाना चाहिए था। ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ है ज्ञानार्जन की स्थिति।
अविवाहितावस्था यह अर्थ उसमें बाद में जोड़ा गया है। ब्राह्मणों ने गृहस्थाश्रम का समय बढ़ाने के लिए उसमें वानप्रस्थाश्रम जोड़ा। ब्रह्मचर्य के बाद संन्यास (परिव्रज्या) स्वीकारने पर ब्राह्मणों को आपत्ति थी। ग्यारह सौ सालों के बाद कुमारिल भट्ट ने बुद्ध पर लगाए आरोप में बुद्ध के परिव्रज्या की आजादी पर ही जोर दिया है।
बुद्ध का वैदिक धर्म से चौथा विरोध चतुरवर्ण के लिए था। उसके शिष्य उच्च-कनिष्ट मानी गई सभी जातियों में से थे। अपने शिष्यों के बीच उच्च-निम्नता की भावना को जगह न रहे इसलिए वह बहुत दक्ष रहा करते थे। अपने चचेरे भाइयों को अपने क्षत्रियत्व का अभिमान न महसूस हो इसलिए उसने उनके साथ आई उपाली को प्रथम दीक्षा दी। जिसकी दीक्षा पहले होती है उसे बाद में दीक्षा लेने वाला वंदनीय माना करता था। इसीलिए उनके क्षत्रिय शाक्यों को उनकी पुरानी नापित सेवक को अभिवादन करना पड़ता था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में चुंद नामक हीन जाति के माने जाने वाले लुहार के घर काखाना अपनी सेहत के लिए नुकसानदेह है यह जानते हुए भी उसने ग्रहण किया और सामाजिक समता के लिए अपने प्राणों से मोल चुकाया। इस प्रकार के कई चतुरवर्ण विरोधी प्रसंग बुद्ध के जीवन में दिखाए जा सकते हैं। वह अपने संघ को सागर की उपमा दिया करते थे। जिस प्रकार सागर से मिलने के बाद नदी का अलग अस्तित्व नहीं बचता और सारा जल एकरूप हो जाता है उसी प्रकार संघ में आने वाले भिन्न वर्णीय भिक्षुओं का वर्णवैशिष््यखत्म हो जाता है। जैन मत में भी चतुरवर्ण निषिद्ध था। लेकिन इस मुद्दे पर वे झगड़ने के लिए तैयार नहीं थे। बुद्ध मात्र अपने मुद्दों के बारे में ढुलमुल मौन व्रत नहीं रखता था। अपने धर्म के हम वीर हैं और उसकी स्थापना के लिए हमें अज्ञान के साथ लड़ना तो पड़ेगा ही ऐसा उनका मानना था। बुद्ध की यह चतुरवर्ण