350 25-11-1956 बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा है यह कहना एक शरारत और छल-कपट है - काशी - Page 515

496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विरोध की भावना ब्राह्मणों के मन में हमेशा चुभती रही। इसीलिए चतुरवर्ण के बारे में मूक रहने वाले निराशावादी सांख्याचार्य कपिलमुनी को उन्होंने अपना कहा लेकिन बुद्ध को हमेशा दुश्मन ही माना।

बुद्ध का वैदिक धर्म के लिए पांचवा विरोध देवता और आत्मा के अस्तित्व के बारे में था। बुद्ध की राय में सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, न्यायी और प्रेममय भगवान का अस्तित्व ज्ञान के साधन पंचेंद्रिय और तर्क की सहायता से साबित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा धम्म का उद्देश्य दुख निवारण का है। भगवान को मानने से दुख कम नहीं होता। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए जिससे कि सभी लोग सुखी होंगे यह सिखाना धर्म का प्रमुख काम है। इसीलिए धम्म का भगवान या ईश्वर से संबंध नहीं आता। भगवान का या ईश्वर अस्तित्व केवल खोखले तर्क पर (speculation) आधारित है और अस्तित्व की श्रद्धा के कारण पूजा, प्रार्थना, पुरोहित आदि अष्टांग मार्ग की समदृष्टि के लिए घातक मूर्ख मान्यताओं का (superstition) भंडार

खुलता है। मनुष्य के परस्पर संबंध प्रज्ञा, शील, करुणा, मैत्री से नियंत्रित होने की जगह पवित्रता, उच्च-नीचता जैसी भ्रामक मान्यताओं से नियंत्रित होते हैं। भगवान के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की आपत्तियां केवल व्यावहारिक ही थीं ऐसा नहीं है। ‘प्रतिच्च समुत्पाद’ के उनके सिद्धांत में भगवान के अस्तित्व पर आम तार्किक आपत्तियां उन्होंने उठाई हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भगवान है या नहीं यह मुख्य सवाल नहीं है। मुख्य सवाल यह भी नहीं है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण किया या नहीं। मुख्य सवाल यह है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण कैसे किया? भगवान के अस्तित्व काखंडन अथवा मंडन इस सवाल के जवाब से होगा। इस हिसाब से महत्वपूर्ण सवाल यह है - ‘‘भगवान ने इस दुनिया का निर्माण अभाव में से किया या पहले से अस्तित्व में होने वाली किसी चीज से किया?’’ कुछ भी नहीं था उसमें से कुछ निर्माण किया इस बात पर मनुष्य की बुद्धि विश्वास नहीं कर सकती। अगर इस तथाकथित भगवान ने यह दुनिया पहले जो कुछ था उसमें से निर्माण किया तो हमारी उत्पत्ति से भी पहले से वह अस्तित्व में थी यह मानना पड़ेगा। तो फिर जो पहले से था उसके निर्माण का कर्ता भगवान को नहीं माना जा सकता। कुल मिला कर अस्तित्व से संबंधित सोच तर्काधारित होने के कारण भगवान के प्रति श्रद्धा बुद्ध के समदृष्टि प्रधान धम्म को मान्य नहीं।

वेदांत का मोक्ष सिद्धांत यानि आत्मा का ब्रह्म में विलीन होना भी तर्कसंगत करार देकर और मानवी जीवन सुखी करने के दृष्किण से निरुपयोगी मान कर बुद्ध ने उसका विरोध किया है। ब्रह्म के बारे में बुद्ध के विचार वशिष्ट और भारद्वाज इन दो मुनियों के साथ उसके हुए संवाद से व्यक्त होते हैं। आत्मा के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की व्यावहारिक आपत्तियां उसकी भगवान की कल्पना के बारे में जो आपत्तियां हैं उसी प्रकार