350 25-11-1956 बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा है यह कहना एक शरारत और छल-कपट है - काशी - Page 516

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की हैं। साथ ही आत्मा के नाम पर दिखाए गए कार्य व्यापार को वह नामरूप सिद्धांत के सहारे स्पष्ट कर दिखाता है। काया की उत्पत्ति के साथ ही अहसास (consciousness) की भी शुरुआत होती है। इच्छात्मक, भावात्मक और विचारात्मक कार्य अहसास के ही हैं। इसलिए आत्मा के अलग अस्तित्व को मानने की जरूरत ही नहीं है।

इस प्रकार वैदिक धर्म के विरोधी बौद्ध धम्म को नेस्तनाबूत करने के लिए ब्राह्मणों ने भले-बुरे सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग किया। बौद्ध धम्म जिन बातों के कारण लोकप्रिय हुआ वे बातें अपने पुराने जमाने से चले आ रहे धर्म को मान्य न होने के बावजूद उन्होंने उनका उपयोग किया। इस प्रचार पद्धति को अपनाकर ही वेरुल की बौद्ध गुफाओं के पास उन्होंने अपने ब्राह्मण धर्म की गुफाएं उकेरीं। असल में ब्राह्मण गृहस्थाश्रमी। अग्निहोत्र उसका नित्यव्रत। उसे परिमार्जित भिक्षुओं की तरह गुफाओं आदि में रहने की कोई वजह दिखाई नहीं दी। बरसात के तीन महीनों तक किसी सुरक्षित जगह वास करने का बुद्ध का आदेश था। सो उन्हें गुफाओं की आवश्यकता थी। गृहस्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मण को वह नहीं थी। लेकिन बौद्धों की गुफाओं की ओर उपासकों का बड़ा समूह आकृष्ट होता है केवल इसीलिए उनकी गुफाओं के पास ही उन्होंने अपनी गुफाएं उकेर कर अपने धर्म की ओर उपासकों कोखींचने की कोशिश की। हिंदू पंडितों के अनुसार बौद्ध धर्म के लोप होने का मुख्य कारण यह नहीं था कि कुमारिल, शंकराचार्य आदि द्वारा बौद्धमत का वाग्युद्ध में पराभव किया गया था। क्योंकि दोनों ने बुद्ध की सीख का केंद्रीय सिद्धांत - यानी सामाजिक समता, दुनिया के दुख के परिहार के लिए हर व्यक्ति का मन परिवर्तन, नीति तत्वों की सामाजिक जीवन में स्थापना, बुद्धिवाद आदि पर इन पंडितों ने कोई आघात नहीं किया है। इन दोनों पंडितों के बाद बौद्ध धर्म भारत में कई सालों तक समृद्धावस्था में था। बौद्ध धर्म के ”ास का मुख्य कारण था जिन विभिन्न संस्कृतियों के और विभिन्न सांस्कृतिक स्तर के लोगों में उसका प्रसार हुआ, उनके आचार और मान्यताओं की बौद्ध धर्म पर हुई अनुचित प्रतिक्रिया। भारत के बौद्ध धर्म पर हुआ सबसे बड़ा आघात था इस्लामी आक्रमण। भारत की ओर आते हुए इस्लामी आक्रामकों को जो परधर्मी लोग मिले वे ज्यादातर बौद्धधर्मीय ही थे। उनकी भाषा में मूर्ति को बुत कहा जाता था। बुतशिकन यानी मूर्तिभंजक। यह उनके हिसाब से गाझीपन का लक्षण था। हिंदुओं से अधिक बौद्धों पर उनके हमले अधिक हिंसक और विध्वंसक थे। उनके द्वारा किए गए बौद्ध भिक्षुओं के कत्लों के कारण 11 से लेकर 13 वीं सदी के इतिहास के पन्ने रक्तरंजित हैं। नालंदा जैसे विश्वविख्यात बौद्ध विश्वविद्यालय का उन्होंने सर्वनाश किया। हिंदुओं की तरह ही बौद्धों में भी धर्मप्रसार का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी करने वाला ब्राह्मणों जैसा वर्ग नहीं होने के कारण भिक्षुओं के कत्ल के बाद बौद्ध धर्म का बड़ी तेजी से लोप होने लगा। सत्य की भी कभी-कभी पराजय होती है इसका यह एक उदाहरण है। लेकिन आज उसके 600 सालों के बाद भारत को बुद्ध की याद आ रही है और आज