351 25-11-1956 मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा के यह आधार पर संबंध जोड़ने वाले बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है समता - सारनाथ - Page 518

 499

351

मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा के आधार पर संबंध जोड़ने वाले

बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है समता

दिनांक 25 नवंबर, 1956 के दिन शाम को सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार के मैदान में महाबोधि सभा द्वारा डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

शुरु में मंगलाचरण के बाद लद्दाख के लामा लोबजघ् ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को ‘खदा’ यानी वÐ भेंट किए। उसके बाद वाराणसी की 18 संस्थाओं ने उन्हें फूलमालाएं प्रदान कीं। सेवासंगम ट्रस्ट की ओर से डॉ. एन. एन. शर्मा ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को दो सुंदर स्वर्ण स्मृतिचिन्ह भेंट किए। डॉ. बाबासाहेब का भाषण सुनने के लिए सारनाथ के आसपास के जिलों से बड़े पैमाने पर जनसमुदाय उपस्थित था। ख्1,

इस कार्यक्रम कीखासियत यह थी कि यह सभा महाबोधि के बुद्ध विहार के प्रांगण में धम्मेक स्तूप की छाया में थी। बुद्ध ने जहां पंच वग्गीय भिक्षुओं को अपना पहला उपदेश कर धम्मचक्र प्रवर्तन किया उस जगह सम्राट अशोक ने एक स्तूपखड़ा किया था। उस स्तूप का नाम धम्मेक स्तूप है। वहीं डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बहुजन जनता को सम्बोधित कर आखिरी भाषण हो यह अभिभूत कर देने वाला और क्रांतिकारी संयोग है।

बाबासाहेब के बारे में बताते हुए भिक्षु धर्मरक्षित ने कहा, बौद्ध देशों में एक श्रद्धामयी धारणा प्रचलित है कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद ढाई हजार सालों के बाद भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान होने वाला है। मेरी श्रद्धा है कि जो बोधिसत्व यह काम पूरा करेगा वह आज हमारे बीच डॉ. बाबासाहेब के रूप में हमारे बीच उपस्थित है। इसी सारनाथ में पच्चीस शतक पूर्व पांच भिक्षुओं के सामने आज जैसे ही एक रविवार के दिन इस सामने वाले धम्मेक स्तूप की जगह भगवान ने धर्मचक्र का परिवर्तन किया। उसी धम्मचक्र को नागपूर में गति देकर पांच लाख लोगों के हृदय में धम्म का पवित्र संदेश पहुंचाने वाले महापुरुष का आज हम स्वागत कर रहे हैं।

प्रशांत और पवित्र स्मृति से भरा वातावरण, चारों ओर भक्तिभाव से ओतप्रोत बैठी बहुजन जनता और लंका, तिब्बत, ब्रह्मदेश, जापान आदि देशों के कुछ लामा, भिक्षु और

  1. धर्मदूतः सारनाथ, दिसंबर 1956, पृ. 246-247