351 25-11-1956 मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा के यह आधार पर संबंध जोड़ने वाले बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है समता - सारनाथ - Page 519

500 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उपासक लोगों की उपस्थिति के कारण शायद डॉ. बाबासाहेब का मन भर आया। कंठ रुंध गया।

सजल आंखों और रुंधे गले से दिया गया वह एक करुणामय भाषण था। बाबा का वह अंतिम संदेश साबित हुआ।

अपने स्वागत का जवाब देते हुए डॉ. बाबासाहेब ने कहा-

लंबी यात्रा के कारण मुझे थोड़ी थकान हो रही है। मैं यहां केवल आपसे स्वागत में मिलने वाली फूलमाला पाने के लिए आया था। लेकिन मुझसे मिलने की आपने जो उत्सुकता और आस्था प्रकट की है उसके बदले में आपसे चार शब्द कहना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। आपमें से कई लोगों को अस्पृश्य माना जाता है। भगवान बुद्ध के समय में अस्पृश्यता नहीं थी। सांस्कृति के स्तर पर कमतर जमातें उस जमाने में भी थीं लेकिन उन्हें अस्पृश्य नहीं माना जाता था। अस्पृश्यता का शाप पिछले डेढ़ हजार सालों का है और उसके लिए जिम्मेदार है हिंदू धर्म। अस्पृश्यता हमारा कलंक नहीं है, वह उच्च हिंदू जाति के मस्तक का कलंक है। आज इतने साल हुए लेकिन ये कलंक धोकर हटाने की इच्छा हिंदुओं के मन में ईमानदारी से कभी पैदा नहीं हुई। हमारे रहन-सहन या हमारे काम के कारण वे हमें अस्पृश्य नहीं मानते। हमने सफाई रखी, साफ कपड़े पहने, उच्च व्यवसाय किए, मन को निश्छल और पवित्र रखा, निर्भयता से व्यवहार करने लगे तब भी ये हिंदू हमें अस्पृश्य मानते हैं। इसलिए यह हिंदू धर्म हमें छोड़ना ही होगा। भारत में जो बौद्ध धम्म पैदा हुआ और जिस धम्म ने मनुष्यों के बीच भेदभाव करने से इनकार किया, जिस धम्म का केंद्रीय सिद्धांत समता पर आधारित है उसे अब हमें स्वीकारना होगा। भगवान ने अपने धम्म की स्थापना दुनिया के दुखों का नाश करने के लिए की। अन्य धर्म भगवान और इंसान के बीच संबंध जोड़ने वाले हैं। मनुष्यों के आपसी संबंध प्रेम और करुणा के सिद्धांतों के सहारे जोड़ने वाला एक ही धम्म है - बौद्ध धम्म। बुद्ध ने अपने धर्माचरण का आदर्श संघ के रूप में दुनिया के सामने रखा। उस समाज में कोई जाति-पांति का भेदभाव नहीं। समंदर में मिलने वाली नदी जिस प्रकार समंदर के साथ एकसार हो जाती है उसी प्रकार बुद्ध के समाज में जातियां समाप्त होकर एकरूप हो जाती हैं।

आज डेढ़ हजार सालों से हिंदू समाज में सुधार आएगा, उसमें समता आएगी, थोड़ी अकल आएगी, इसका हम गांव की सीमा से बाहर बैठे इंतजार कर रहे हैं। लेकिन किसी के दिमाग में सुधार काखयाल नहीं आया। किसी ने हमें गांव के अंदर नहीं बुलाया. उल्टे धर्म के नाम पर हमारे साथ ज्यादा से ज्यादा अन्याय-अत्याचार होने लगे। कोई कहते हैं कि समता भारत के लिए अज्ञात थी। पिछली शताब्दी में ही यहां समता के बारे में कानाफूसी शुरू हुई है। हो सकता है धीरे-धीरे हिंदू धर्म में भी सुधार आएगा