351 25-11-1956 मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा के यह आधार पर संबंध जोड़ने वाले बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है समता - सारनाथ - Page 521

502 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

352

मेरे जीवन का सैद्धान्तिक अथवा दार्शनिक आधार

पांच मिनटों में मैं अपने जीवन का दर्शन बताना चाहता हूं। दर्शन का संदर्भ मैं सामाजिक दर्शन के रूप में ही लेता हूं। हर मनुष्य का जीवन के बारे में अपना कोई दर्शन होना जरुरी होता है। अपने सही व्यवहार के लिए मनुष्य के पास कोई कसौटी होना जरुरी है और वह कसौटी है उसका जीवन दर्शन। मैं हमेशा कहता हूं कि हर मनुष्य के पास अपना जीवन-दर्शन होना जरुरी है, क्योंकि इसी दर्शन के सहारे वह समझ सकता है कि वह सही कर रहा है या ग़लत। वह जब जानेगा कि वहखुद गलत है तभी उसे अपने दर्शन के सहारे अपनी उन्नति पाने की जिम्मेदारी का बोध होगा। मैंने अपने जीवन का दर्शन तय किया है। उस दर्शन के नास्तिक और आस्तिक दोनों पक्षों को आज मैं स्पष्ट करने जा रहा हूं। सांख्य दर्शन के त्रिगुणों पर आधारित और भगवद्गीता में विषद किया हुआ हिंदुओं का नास्तिक पक्ष दर्शन मुझे नापसंद है। मेरी राय में ऋषि कपिल के दर्शन का वह घोर विकृत स्वरूप है। उसी के कारण जातिव्यवस्था और श्रेणीगत विषमता की व्यवस्था हिंदुओं के सामाजिक जीवन का एक मूलभूत नियम बन गया है। आस्तिक पक्ष मेरा जीवन-दर्शन केवल तीन शब्दों में ही व्यक्त हुआ है। स्वतंत्रता, समता और भाईचारा। कोई यह न समझें कि फ्रांसीसी क्रांति से मैंने अपना जीवन-दर्शन उधार लिया है। मैं एक बार फिर यह बात साफ-साफ कह देता हूं। मेरे दर्शन की जड़ राजनीति में नहीं, धर्म में है। मेरे गुरु भगवान बुद्ध की शिक्षा से ही मैंने यह दर्शन स्वीकारा है।

मैं आपको विनम्रता से बता दूं कि, मेरे जीवन संबंधी दर्शन में आजादी को विशेष स्थान है। लेकिन साथ ही प्रतिबंध आजादी समता के लिए मारक साबित होती है। मेरे दर्शन में समता का स्थान स्वतंत्रता से ऊंचा है। इसके बावजूद उसमें संपूर्ण समता के लिए बिल्कुल भी जगह नहीं। क्योंकि असीमित समता आजादी के अस्तित्व के लिए संकट पैदा करती है और आजादी के लिए जगह हो यह आवश्यक तो है ही।

स्वतंत्रता और समता के अतिक्रमण से सुरक्षा पाने भर के लिए मेरे दर्शन में कायदा और कानून का स्थान तय है। हालांकि कानून का स्थान मेरे हिसाब से बहुत ही नगण्य है। क्योंकि स्वतंत्रता और समता के भंग होने की स्थिति में कानून यकीनन समर्थ भूमिका निभा सकता है इसका मुझे भरोसा नहीं है। मैं भाइचारे को सर्वोच्च स्थान देना चाहता हूं

3 अक्तूबर, 1954 को दिल्ली आकाशवाणी से दिए भाषण का अनुवादः मुक्तछंद 1976. पुनः मुद्रित - गांजरे,खंड 7, पृ. 149-50